चाऊमिन राजा(हास्य व्यंग्य)

महंगाई बढ़ रही है। रोजगार घट रहें  हैं। युवा बेरोजगार हो रहें हैं । सरकार के मंत्री तरह – तरह के बयान दे रहे हैं। कोई पकौड़े बेचने को कह रहा है ।तो कोई आलू  से सोना बनाने को , तो कोई नाले के गैस से खाना बनाने को कह रहा है। देश में जब से विदेशी निवेश बढ़ा है ।तब से गोल मटोल पिज़्ज़ा बर्गर के बिक्री भी बढ़ा  है ।फास्ट फूडो की बाढ़ आ गई है। शाम को सज धज के बाजार जाओ तब ठेले पर जहाँ-तहाँ बर्गर ,गर्म तेल में स्विमिंग कर रहा है। वह खुश है। शहर से निकलकर गांव आ चुका है और देसी चटनियों से उसका संयोग हो गया है ।वह मजे में है उसका चिर परिचित दोस्त चाऊमीन साथ निभा रहा है। वह मुंह से लटकर छटपटा नहीं रहा है ।बल्कि झूला झूल रहा है ।उसे परम आनंद की अनुभूति हो रही है ।कहते हैं  जब व्यक्ति को आनंद की अनुभूति होती है तो नाचने का मन करता है। जी चाहता है नाचते-नाचते कमर तोड़   लें लेकिन आज के बाबा टॉर्च जलाकर नाचते हैं उनके ऊपर फ्लेक्स मारा जाता है तो बाबा रंगीन नजर आते हैं। भक्तों को खूब भातें हैं ।मौका मिलने पर  फिल्म भी  बनाते हैं । भजन भी गाते हैं ।युवा अचंभित हो जाता है । सोचने लगते हैं ,बाबा को मुक्ति मिल गई है ।वह कैसे पीछे रह गए । कुछ दार्शनिक कहते हैं ।प्रेम अंधा होता है। कभी भी कहीं भी हो सकता है ।भजन सीखते -सीखते परम शिष्या, बाबा के उम्र के गवैया से ही प्यार कर बैठती है। इस पर कुछ लोगों का कहना है । वर्षो तक   भगवान के भजन का प्रतिफल है जो अब   फलीभूत हुआ है। ऐसा भी हो सकता है ,इंद्र का कोई चाल हो और हमारे बाबाओं के घोर तप और किए जा रहे  परोपकार से डरकर आधुनिक उर्वरसी भेज दिया हो और आदेश दिया हो जाओ परम लावणीयों, चितचोर बाबाओं का साधना अस्तखलित  कर दो। कहीं ऐसा ना हो हमारा सिंहासन खतरे में  पड़ जाए । जो भी हो चाऊमीन बड़े शहरों से निकलकर खुले आसमान के नीचे तवे पर विराजमान है ।वह खुले आकाश को देख रहा है ।वह अपने आप में मगन है ।उसके दोस्त साथी धूल ,मिट्टी, हवा के झोंकों के साथ उसका साथ निभा रहे हैं। वह मक्खी जो कभी उसके  आस पास सिर्फ मडराती   थी ।वह गेहूं के बालों पर नहीं बैठ सकती थी ।आज उसके स्वाद का सुगंध ले रही है। यहां सभी मिल गए हैं । बड़े तवे   पर विराजमान आलू चप , पियाजी ,एग रोल ,मोमोस के बीच  चाऊमीन अपने को राजा मान बैठा है । यह देसी आइटमो के तबीयत पर हंस रहा है। यहाँ   सभी थाल में पड़े धूल फांक रहे हैं । इनको कभी -कभी गुस्सा आता है ।लेकिन कर भी क्या सकते हैं ।एक  दिन वे  शुद्ध स्वदेशी बाबा के पास चले गए कि बाबा हमें भी स्वदेशी आइटमो के फेहरिस्त में शामिल कर लें या कालेधन की तरह उनके लिए भी धरना दें।

यह गोरा चाऊमीन नन्हें-नन्हें आंखों का सुरमा बन गया है ।बाबा सरकार को जाने का इंतजार कर रहे हैं । लोगों को भ्रम है ।देसी आइटम को खाने से पेट  खराब हो जाता है ।पेट घड़-घड़ करने लगता है। हमारे पड़ोस के ताऊ को बहुत दिनों से चटक मटक खाने की इच्छा थी ।और  एक दिन आव देखा न ताव , वे जी भर के प्याज के पकोड़े खाए फिर बाद में पता चला धोती खराब कर ली उनका हाजमा ठीक नहीं था ।कोई चूर्ण काम नहीं आया, पेट सफा का असर ऐन मौके पर होगा ।उन्हें पता नहीं था ।देसी पकौड़ीओं को खाने का यही  डर है ।आलू चप बेचारा चुप है ।वह अपने नाम को धारण कर लिया है ।अब वह आलू चुप हो गया है ।बेईमान दुकानदार बेसन में आटा मिलाकर आलू चप  बना रहे हैं। जिसे स्वाद बिगड़ रहा है ।वह दुखी है ,अपने दुर्गति पर ।प्याजी ! अब क्या जी हो गया है ? और  हर  कोई सिर्फ उसका हाल पूछ रहा है।

धर्मेन्द्र कुमार निराला निर्मल

कोरोना ह का रे(भोजपुरी हास्य कविता)

दिन भर घरे बइठल-बइठल रहनी

मन ना मानल चल गइनी सरसो उखाड़े

शरीर के ताप बढ़ल

घर अइनी बुखारे

हाथ मुह-धोवनी

लगनी छींक मारे

गला मे खड़ास भइल ,

पेट लागल  घड़-घड़ मारे

बाड़े एगो रामबेचन पाड़े

पाँचवाँ ले पढ़ल बारे

कहले जोर से ,

करोना ह का रे

माई हमार लगली रोए

भौजी भगली बहरे

बाबुजी मड़ले अजवाइन के धुआं

लोग कहे लागल हुहां-हुहां

बाद मे बुझाइल एमे मरीचा बा डलाइल

बाबा हमार चिलइले

गाँव के बिगड़ल कौन ह रे ।

—-धर्मेन्द्र कुमार निराला निर्मल

प्रेरणादायक विचार

विंसेंट वाॅन गाॅग

जन्म:30 मार्च,1853              अवसान: 29 जुलाई 1890



वाॅन गाॅग कि गिनती विश्व के महानतम चित्रकारों मे होती है । उनके चित्रों मे खूबसूरती, भावना और रंगो की प्रधानता थी, जिसने 20वीं सदी की चित्रकला को बहुत हद तक प्रभावित किया। गाॅग ने सारा जीवन मानसिक बीमारियों से लड़ते हुए निर्धनता में गुजारा और जिंदगी भर गुमनाम रहे। वाॅन गाॅग ने लड़ते 2100 से अधिक चित्र बनाए।उनके प्रसिद्ध चित्रों मे

स्थायी नाइट, सन फ्लावर और सेल्सियस पोट्रेट शामिल है ।

  • प्रेम से किया हर कार्य अच्छा होता है
  • सामान्य जीवन एक पक्की सड़क की तरह होता है, जिस पर चलना तो आरामदायक होता है, लेकिन वहां फूल नही खिल सकते।
  • महान चीजें एक क्षण में नहीं होती, बल्कि ये छोटी-छोटी चीजों की श्रृंखला का मेल होती हैं ।
  • मैं हमेशा सोचता हूँ कि ईश्वर को जानने का सबसे अच्छा तरीका है- हर चीज को प्रेम करना।
    *मनुष्य का ह्दय बहुत हद तक समुद्र की तरह होता है ।इसमें तूफान होता है,ऊंची लहरे होती है, लेकिन भीतर गहराई में मोती भी मौजूद होते हैं
  • लोगों को प्रेम करने से अधिक कलात्मक कुछ नही है ।
  • मैं  अपने हर काम में ह्दय और आत्मा झोंक देता हूँ और इस प्रक्रिया में मेरा मस्तिष्क कहीं गुम हो जाता  है ।
  • आप प्रकृति से प्रेम करते हैं तो हर जगह खूबसूरती ढूंढ सकते हैं ।
  • जीवन में हमें केवल एक सबक सीखने की आवश्यकता है- बिना किसी शिकायत के जीना ।
  • प्रकृति से प्रेम बनाए रखिए, कला को समझने का ये सच्चा तरीका है ।
  • हमारे भीतर प्रयास करने का साहस नही होगा तो जीवन किस तरह का होगा ।
  • मैं बोरियत से मरने से बेहतर जुनून के कारण मरना पसंद करूंगा ।

    —————- साभार-दैनिक भास्कर

प्याज का कहर

जिन लोगो को प्याज से प्यार था, वे इससे बेवफाई करने लगे हैं ,उनका कहना है कि प्याज मंहगी हो गई है प्यार से । वैसे प्याज मंहगी हुई है तो अच्छा हुआ घर मे प्यार बढ़ गया है। जो पति प्याज प्याज करते थे – चिकन मे प्याज, आलू मे प्याज, सलाद मे प्याज वो अब चुप हैं । उन्होने मौन धारण कर लिया है और ध्यान मग्न होकर इस तरह देख रहें कि थाली मे प्याज प्रकट हो जाय । रेस्टोरेंट वाले ग्राहक के शिकायत से परेशान हैं। वे सलाद के रूप मे मूली खिलाने लगे हैं और ग्राहक घर मे गैस फैलाने लगे हैं। प्याज से आम आदमी परेशान है,विपक्ष ज्यादा परेशान है। भगवान उसे हर साल इस सीजन मे परेशान होने का, जनता का दर्द समझने का मौका देते हैं, तो वह काहे पीछा रहे।

अब तक प्रसाद के रूप मे भण्डारे मे भीर लगती थी,
अब गरीब लोगो को प्याज के लिए भण्डारा हो रहा है।इस तरह के भण्डारे को धर्मराज को ऊँच श्रेणी का दान मान लेना चाहिए। और अपने बही खाते मे दान के अलग रूप मे दर्ज कर लेना चाहिए।
अब तक अन्न दान, धन दान और वस्त्र दान को ऊँच श्रेणी मे रखा गया है लेकीन भविष्य मे दान का स्वरूप बदल जाएगा।
वारिष नही होगी, अन्न उपजेगा नही फिर दानवीर लोग आलू,प्याज,दाल का दान करेंगे। वैसे पब्लिक समय-समय पर दाल और प्याज के भाव से कोमा मे रहती है। अभी अरहर चूप है, वह भी अपना भाव बढ़ाना चाहेगा। आजकल प्याज को गर्व है अपनी ऊँचाई पर,लेकिन उसके दोस्त-साथी को जलन हो रही है।वे चिल्ला रहे हैं, भाई इतना ऊपर मत चढ़ ,नही तो गिरेगा तो फट जाएगा फिर अगली बार तेरी पैदावार घट जाएगी।सरसो-पालक को कोई पूछ नही रहा है,
नया आलू बाजार मे बिना शोर- शराबे के आ गया है।बैगन भी लाल पीला हो रहा है।बिना लहसून का बैगन का चोखा कैसा। सारा शोर प्याज को लेकर हो रहा है लहसून भी कम नही है, बेचारा अपनी चर्चा मिडिया मे नही होने से नाराज है। उसका शिकायत है कि प्याज का ही पब्लिसिटी हो रही है मेरी नही।प्याज लाॅकरो मे रखा जाने लगा है। अब तक लोग मांस-मछली काले पोलीथीन मे लाते थे,अब प्याज भी लाने लगे हैं। ताकी लोग नही जाने की प्याज आप खा रहें है।पहले लुटरे बैंक मे बैठ कर आने-जाने वालो का ट्रानजेक्शन पर नजर रखते थे, अब वे सब्जी बाजार मे इवनिंग वाॅक करने लगे हैं, उनका सेहत भी सुधर रहा है, और सी सी टीवी का खौफ भी नही है। उनका नजर प्याज खरीदने वालो के हाथो पर है ।जगह जगह प्याज की चोरी हो रही है। लोग प्याज घर लाते हुए डर रहें है।
——- धर्मेन्द्र कुमार निराला निर्मल

पाटलीपुत्र का बाढ़(हास्य व्यंग)

चारो तरफ जल ही जल है,भूपृष्ठ कहीं दिखाई नही दे रहा है। जहाँ कल मानव जीव चलता था वहाँ नावें चल रही है।अहो भाग्य हो विकास का, गंगा जी जनता द्वार तक आई हैं और वे घरों मे दुबक गये।आरोप है कई सालो से नालों कि सफाई नही हुई,नालों से पानी निकल कर  भागा नही और ऊपर ही ऊपर दौड़ने लगा।नेता लोग एक-दूसरे पर आरोप -प्रत्यारोप लगा रहें है,। मुझे पानी कहते हुए इसका अपमान महसूस हो रहा है क्योंकी यह  आम पानी नही है इसमे पाप को धोने के शक्ति विधमान है लेकीन दुर्भाग्य है गंगा जी जब द्वार पर आई तो पाटलीपुत्र घरों मे सुबक रहें हैं ,कई दिनो बाद पता चला,कि अमुक -अमुक नेता अपने घरो मे जनता कि नजर से नजर बन्द हैं। गंगा भक्त इस जल मे डुबकी लगाने से कतरा रहें हैं।मिडिया वर्ग का पता नही कहाँ गुम हो गई है वह ऊचाई पर से ही फ्लैक्स मार रही है और लेजर बीम से पानी कि गहराई माप रही है। जलसो के समय तो उसका कैमरा 360 डिग्री घुमता है लेकीन इस बार उसका कैमरा पानी मे डुबुकिया न मार ले यही मोह उसे घेर रखा है। वह इंसान काहे का,जो कभी पानी से,कभी आँधी से डर जाए।जीवन के कठिन परिस्थितियों मे राग निकलती है और यहाँ कई रागी – वैरागी परेशान हो गये। नेता जी पानी से घीरे हुए हैं और कई दिनो से भूखे-प्यासे हैं वे गंगा मईया का व्र त बता रहे हैं ।वे फेंके गये खाने के पैकेट को खाएंगे नही, नेता स्वालंबी जीव होते हैं । उनके हाथ बहुत लंबे होते हैं लेकीन उठाएंगे नही। उन्हे मालुम है इसमे क्या  है। ईधर धुर विरोधीयों को हड़ताल के लिए जमीन अलाट नही हो रही है।वे परेशान हैं उनके माथे से तर-तर पसीना चू रहा है चिन्ता से नही श्र म से । वे कैसे  बताए कि उनकी पार्ट्री कितना हितैषी है। लोग विवश हैं , कोई इस संकट को प्राकृतिक आपदा बता रहा है तो कोई देवी का प्रकोप।

 मुझे आश्चर्य हो रहा है इस बार नेता जी का भैंसिया नजर नही आ रही है जिनका दावा है कि इतना पानी उनकी भैंसिया पी जाती है।

—————- धर्मेन्द्र कुमार निराला निर्मल

हे!गंजे मानुष(हास्य व्यंग)

गंजे लौण्डो कि संसार निराली होती है, सभा हो या फैशन सो,आॅफिस हो या दोस्तो कि महफिल सभी जगह बेचारे को सुनना पड़ता है,हर कोई वैसे फिल्म का रामपाल यादव नही होता कि गंजे कहने पर कोर्ट मे मानहानी का मुकदमा ठोक दे। बड़े बाबुओं कि मानहानी होती है तो इन कुआंरे लौण्डो कि भी होती है।उसका जीवन कटा-छँटा,फटा-वटा बितता है। नहाने पर पानी तो उसके सर पर ठहरता ही नही।वह बन्दा हर रोज महसुस करने की प्रबल कोशिश  करता है कि आज नहाया है,लेकीन  उसे लगता ही नही वह आज नहाया है । वह किमती हेयर आॅयल लगाता है कि कभी तो पतझड़ के बाद बसंत आएगा। लेकीन घोर दुर्भाग्य कि आधे से अधिक तेल चालीस किलोमीटर प्रती घण्टे के रफ्तार से उसके कंधो पर पँहुच जाता है दोनो ओर,मानो कोई मैराथन दौड़ हो रही हो तेल बुन्दो मे। फिर वह चुपड़-चुपड़ कर  माथे पर लगाता है लेकीन बाद मे पता चलता है कि वहाँ बाल हि नही ,फिर हाथ पीछे खींच लेता है

गौर की बात है सभी मर्ज की दवा सरकार के पास है लेकीन  गंजेपन के समाधान का कोई राष्ट्रीय योजना सरकार के पास नही, वाह रे व्युरेक्रेसी, माना कि गंजेपन होना करोड़पती होने कि निशानी है पर किसके लिए, जिनके बैठे-बैठे कुर्सी और नोट गिनते-गिनते हाथ टूटे जा रहें है उनके लिए लेकीन बाकी लोगो के लिए यह मजाक ही है। देश मे गंजेपन के वजह से कुंआरो कि संख्या दिन दूनी रात चौगुनी बढ रही है।  साथ मे अरोसी-परोसी,संगी-साथी,टोले-मोहल्ले,परिवार-रिस्तेदार व्दारा बहु ढूढंते-ढूढते कई बार घर कि महिलाएँ गोधन कुट देती है फिर वो जीला देती है भाभी कि आशा मे। वह बेचारा सारा दिन कुर-कुराता रहता है,उसे खीझ आती है अपने कामदेव पर। कई दोस्त तो उसे एक्सपायरड मान लेते हैं फिर भी जिंदादिल बना रहता है लेकिन ऐसे मनसुख सपने बहुताय देखते है जो सर्वजन हिताय कम ख्याली पुलाव ज्यादा होता है वे द्रवित होकर कहते हैं ,हे!जनमानस तुम भी एक दिन गंजे होगे,फिर पुआल पर ढिमिलिया क्यों मार रहे हो,हमारा भी मान -मनुवल करो और सुनो-
शौक से मत देखो,मगर नजर तो न चुराओ

लहराते बाल नही तो क्या,जिंदादिल है पास तो आओ।


————– धर्मेन्द्र कुमार निराला निर्मल

सनातन चप्पल(हास्य व्यंग)



दुनिया तेजी से बदल रही है और हर तरफ फैशन का जलवा है, सोचता हूँ जनभागीदारी नही तो कम से कम मेरी भागीदारी हो। कोई हनी सिंह कट बाल कटवा रहा है, कोई गुरू रंधवा कट ।

भले जिन्स लुढ़क कर चौखट पर आ जाय, लेकीन यह फैशन हो गया। मेरे दिमाग मे कई दिनो से खुसुर- खुसुर होने के बाद एन आइडिया कैन चेंज माई लाईफ आया कि जब भारतीय युनिवरसल ड्रेस धोती, कुर्ता,लंगोट और खड़ाऊँ

भूल गएं है तो क्यों न मंहगाई मे खड़ाऊँ पहना जाय ।

मुझे धोती, कुर्ता और लंगोट महँगा लगता है, पता नही कब फट जाय और बदन उघड़ जाय फिर भरे बाजार मे बेईजती होगी सो अलग । प्राचीन ऋषी-मुनी खड़ाऊँ पहनते थे अब यह सनातन चप्पल विलुप्त होने के कगार पर है। मै उत्सुक हूँ ।अपना ट्रेण्ड चलाने के लिए ;अगर कोई स्तार बिग बाॅस मे खड़ाऊँ पहने गृह प्रवेश कर ले तो फिर खड़ाऊँ टीवी पर डिबेट मे रखा जाएगा फिर इस पर राष्ट्रीय स्तर पर  बहस 
शुरू होगी। लोग सभा-चट्टी मे चप्पल कि जगह खड़ाऊँ चलाने लगेंगे तब डर है कहीं नेता जी का नाक न टूट जाय, फिर खड़ाऊँ पर रोक लगाने के लिए सरकार को नया अध्यादेश लाना पड़ेगा, संसद मे बहस होगी। विपक्ष इसका लोगों की स्वतंत्रता का हनन बोल कर विरोध करेगी। मुझे डर है, कहीं वे भूख हड़ताल पर न चले जाए क्योंकी कौन नही चाहेगा हो रही विकास के भाषण पर फूल वर्षा हो और जनता के भीड़ को सम्भालने के लिए डण्ड वर्षा और एक नेता जी दुसरे नेता जी पर चुटकी लें । फिर खड़ाऊँ को नाक के लिए खतरनाक हथियार के श्रेणी मे डाल दिया जाएगा , उसके बाद कई राष्ट्रीय- अंतराष्ट्रीय बाबा उखड़ जाएंगे और हड़ताल पर चले जाएंगे और बाबा रामदेव का भाषण सुनाई देगी- हें ये भी कोई कानून है ;सनातन चप्पल पर रोक,
यह घोर अन्याय है साधु संतो के साथ ।

धर्मेन्द्र कुमार निराला निर्मल

तू जिन्दा है तो जिन्दगी की जीत मे यकीन कर

तू जिन्दा है तो जिन्दगी की जीत मे यकीन कर

अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला जमीन पर

ये गम के और चार दिन

सितम के और चार दिन

ये दिन भी जायेंगे गुजर,

गुजर गये हजार दिन

कभी तो होगी इस चमन पे भी बहार की नजर

अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला जमीन पर

तू जिन्दा है तो जिन्दगी की जीत मे यकीन कर

सुबह और शाम के रंगे हुए गगन को चुमकर

तू सुन जमीन गा रही है

कब से झूम-झूम कर

अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला जमीन पर

तू जिन्दा है तो जिन्दगी की जीत मे यकीन कर

हजार भेष धर के आई मौत तेरे व्दार पर

मगर तुझे न छल सकी,

चली गई वो हारकर,

नई सुबह के संग सदा तुझे

मिली नई उमर

अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला जमीन पर

तू जिन्दा है तो जिन्दगी की जीत मे यकीन कर

हमारे कारवां को मंजिले का इंतेजार है

ये आँधियों , ये बिजलियों की पीठ पर सवार है

तू आ कदम मिला के चल

चलेंगे एक साथ हम

अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला जमीन पर

तू जिन्दा है तो जिन्दगी की जीत मे यकीन कर

जमीं के पेट मे पली अगन

पलें है जलजले

टिके न टिक सकेंगे भूख रोग के स्वराज ये

मुसीबतों के सर कुचल ,

चलेंगें एक साथ हम

अगर कहीं है स्वर्ग तो

उतार ला जमीन पर

तू जिन्दा है तो जिन्दगी की जीत मे यकीन कर

बुरी है आग पेट की,

बुरे हैं दिल के दाग ये

न दब सकेंगे, एक दिन बनेंगे इंकलाब ये

गिरेंगे जुल्म के महल,

बनेंगे फिर नवीन घर

अगर कहीं है स्वर्ग तो

उतार ला जमीन पर

तू जिन्दा है तो जिन्दगी की जीत मे यकीन कर————

————– शंकर शैलेन्द्र



वक्त का करिश्मा

मैंने हर रोज जमाने को रंग बदलते देखा है

उम्र के साथ जिंदगी को ढंग बदलते देखा है

वो जो चलते थे तो शेर के चलने का होता था गुमान

उनको भी पाँव उठाने के लिए — सहारे को तरसते देखा है

जिनकी नजरों की चमक देख सहम जाते थे लोग

उन्ही नजरो को बरसात की तरह रोते देखा है

जिनके हाथों के जरा से इशारे से टूट जाते थे पत्थर

उन्हीं हाथो को पत्तो की तरह थर थर काँपते देखा है

जिनकी आवाज को कभी– बिजली के कड़कने का

होता था भरम

उनके होंठो पर भी जबरन

चुप्पी का ताला लगा देखा है

ये जवानी, ये ताकत, ये दौलत

सब कुदरत की इनायत है

इनके रहते हुए भी इंसान को बेजान हुआ देखा है

अपने आज पर इतना  ना इतराना यारों

वक्त की धारा में

अच्छे अच्छों को मजबूर हुआ देखा है

कर सको तो किसी को खुश करो

दुःख देते तो हजारो को देखा है

———-  *

जिंदगी संवर जाए



किसे खबर है यहाँ किसपे क्या गुजर जाए

जो एक पल के लिए जिन्दगी ठहर जाए

सभी के ऐब हमारी नजर मे रहते हैं

मजा तो जब है कभी खुद पे भी नजर जाए

हजार तंज किसी पे असर नही करते

कोई जमीर की आवाज सुन के डर जाए

जो सिर्फ जिद है उस आवारगी से क्या हासिल

कुछ ऐसा काम करो जिन्दगी संवर जाए

जिसे मलाल हो आईना टूट जाने का

वो पत्थरों के नगर मे न भूल कर जाए

खिले जो फूल वफा के तो यूँ लगा जैसे

खिजां के बाद चमन खुश्बुओं से भर जाए

‘मृदुल’ तवील सफर है तू

एहतियात से चल,

कि तेरे पांव मे गर्दे- सफर

न भर जाए

————— मृदुल तिवारी