वर्चुअल मंच(हास्य व्यंग)

नेता हैरान हैं, कोरोना ऐसा महामारी आया कि उन्हें मारा- मारी , लात- घुसा मारने को नहीं मिल रहा है ।जनता जो नेता जी पर चप्पल उछालती थी। उसे भी ऐसा सौभाग्य प्राप्त नहीं हो रहा है । वह अपना एंड्राॅयड मोबाइल पर प्रहार नहीं कर सकता है । वह लाचार है। वर्चुअल डिबेट मे मजा नहीं आ रहा है। एंकर हैरान हैं।

वे डिबेट में गरमा गरम बहस नहीं कर पा रहे हैं । अगर इस वर्चुअल डिबेट में एंकर इधर चिल्लाया , बंदा कान से लीड निकालकर उधर क्या पता पानी पुड़ी खाने चला जाए। अगर उसके ऑफिस में हो तो हाथ जोड़ कर , पैर पकड़ कर विनती किया जा सकता है । वर्चुअल कवि सम्मेलन हो रहा है। दर्शक वाह – वाह यहां बोल नहीं रहे हैं, टाइप कर रहें हैं। हंस नही रहे हैं बल्कि अपनी भावनाओं को शब्दो में व्यक्त कर रहे हैं – हा -हा। पिछले दिनों देश के एक बड़े नेता जी का वर्चुअल रैली हुआ । उन्होंने बताया यह चुनाव का आगाज है । और उधर विरोधी दल के नेता थालीपीट कर विरोध जताते रहे । यह वर्चुअल रैली का पहला विरोध का अजीब तरीका था। लोग कहतें है- लोहा , लोहा को काटता है। होना भी यही चाहिए था कि वर्चुअल रैली का विरोध वर्चुअल तरीके से होता।सारी दुनिया देखती ,उन्हें भी नया आडिया मिलता । कवि काल्पनिक लोक मे जीता है ।वह अकसर चाँद-तोड़ने कि बात करता है।अब वह चाँद पर वर्चुअल प्रेम का झण्डा गाड़ सकता है और वर्चुअल तारे तोड़कर वर्चुअल तरीके से प्रेयसी को दे सकता है। जमाना बदला है लेकिन दिल के जज्बातों के शब्द नहीं बदले। सुनने देखने का माध्यम बदला है । कहा जाता है, शब्द ब्रम्हा है। वह कभी नष्ट नहीं होता है। चाहे नेताजी वर्चुअल रैली में दूसरे नेता को गाली दे या यथार्थ मे ।असर उतना ही होता है ।कहीं ज्यादा होगा, उसे आसानी से फैलाया जा सकता है। वर्चुअल रैली में इंटरनेट की समस्या आ रही है ।

वक्ता बोल रहें हैं और उधर इंटरनेट गायब। तब नेताजी का मूड ऑफ हो जाता है। जो गर्मी आ गया था शरीर मे अचानक गायब हो जाता है इधर दर्शक दिल थाम के बैठे हैं। उनकी नजर मोबाइल ,लैपटॉप स्क्रीन पर है। राह देखते -देखते उनकी आंखें दर्द करने लगती है । जब नेताजी मुखातिब होते हैं ,पता चलता है दर्शक का मोबाइल बैठ गया है, अगर बैटरी है तो इंटरनेट की स्पीड नहीं है। नेता जी की बात ऐसा लगता है कि बीच बीच में अटक रहा है। रील खराब है या रियल लाइफ पता ही नहीं चलता।

वर्चुअल रैली से मुद्रा की बचत हो रही है ।नेता जी अपने घर में बैठकर विकास का गीत गा रहें हैं और दर्शक भी बंद कमरे में नाच कर खुश हो रहे हैं। पहले ऐसा वे नहीं कर पा रहे थे। प्रोपेगेंडा अब पेंडिंग नहीं रहता बल्कि वर्चुअल मिटिंग उनके काम के तरीके को बदला है । अब वर्चुअल दुश्मन से डर नहीं लगता। अब वे पहले से खुंखार होकर अपने दुश्मन को ललकारते हैं। पहले घटनास्थल पर कुटाई का डर रहता था । अब नही है। मंच पर आकर कोई विरोध करने वाला भी नहीं है । लेकिन एक चीज की कमी खल रही है ।नेताजी का लल्लो चप्पो करने वाले यहां नहीं है। जिसे सुनकर उन्हें परम आनंद मिलता है। अपना मुंह मियां मिट्ठू तो हर कोई बनता है लेकिन दूसरा कोई गुणों की बखान करे तो बांछे खिल जाती है और हर इंसान यही तो चाहता है।

– धर्मेन्द्र कुमार निराला निर्मल

मार इस मच्छर को (हास्य व्यंग)


जब सोता हूँ तो ऐसा नहीं है कि मैं करवट नहीं बदलता, बदलता हूँ भाई । पूरे रात बदलता हूँ। लेकिन मच्छरों का योग इसमे अधिक होता है। सुहाने सपने जो देखा तभी एक मच्छर पैरों पर काटा।  उसने  नींद खराब कर दिया,  इतने मच्छर क्यों  पैदा हो गए देश मे ! इतने की नींद हराम कर दिया है । कान के पास आकर गुनगुनाते रहते हैं ।कुमार सानू के नाईन्टी  के गीत गाते होंगे कि हनी सिंह के पाॅप म्यूजिक मुझे नहीं पता। कई बार कानों को घायल कर  उनके गीतों की भाषा समझने की कोशिश की  लेकिन कुछ समझ नहीं आया। कई बार  मच्छरदानी में घुसे मच्छर को  मारने की असफल कोशिश कर चुका हूँ  लेकिन हर बार पलंग से गिरकर अपने ही टांग तोड़ा लिया । बड़े शैतान हैं ये। 

जमाना क्या से क्या  हो गया  अब मच्छरदानी में मच्छर नहीं फंसते , चूहे दानी  में चूहा और साबूदानी में साबुन नही ठहरता। दानी  शब्द की खोज किसने की है भाषा विज्ञानी को  मेरी सलाम। मेरी भी इच्छा हुई कई बार कि दानी बनु लेकिन  मछरदानी, चूहे दानी नहीं। आज कल मास्क दानी लोगो का बहुत फोटू छप रहा है।  दानी से  कई शब्द बन जाता है , शायद आप खोज भी रहें होंगे लेकिन आश्चर्य है, मच्छर कोई दान नहीं करता बल्कि इस  दानी में फंसकर कालकलवित हो जाता है।  

कई दिनों से एक चूहा परेशान कर रहा था ।मालकिन बोली बाजार से एक चूहा दानी लेते आइएगा । बड़ा परेशान कर दिया है।  रात भर देहीया पर   मैराथन मचा रखा है । रजाई में कभी – कभी घूस जाता है ।जब  रजाई वाली बातें सुना तो  मेरा खून खौल उठा।  छोटा जीव और इतनी हिम्मत।  रणबांकुरे की गृहस्वामिनी को एक चुहा परेशान कर रहा है।  तभी मेरा ख्याल उस कहानी  पर चली गई जिसमे शेर , चूहे  को अपने पंजे में दबाकर क्रोध में बोला- मैं तुम्हे  मार डालूंगा, तभी चूहा गिरगिराने लगा- मुझे माफ कर दीजिए जहाँपनाह।  मैं किसी दिन आपका  काम आ जाऊंगा ।  मैं भी यही सोच रहा था जो आज फिर एक चूहा मेरे सामने गिरगिराएगा लेकिन मैं छोडूंगा नही ।  यह अपराध अक्षम्य है ।

जिस घर में मच्छर और चूहा अपना घर बना ले समझना  चाहिए उस घर से शांति दूर चली गई।  काम का सारा गणित बिगड़ जाता है। घर में फूट पड़ जाता है।  कारण है,  बहुओं की  नींद पूरी नहीं होने पर वे  देर से जगेंगी।  इस पर सास  ताना  मारेगी फिर एक दिन सहते- सहते  एकता कपूर के सीरियल की तरह सास- बहू अलग हो जाएंगी।  ये मच्छर, भारतीय एकता के दुश्मन हैं।  सामाजिक बंधन के दुश्मन हैं।  इन्ही मच्छरों के कारण  एकल परिवारों की संख्या दिनोंदिन बढ़ रही है । जब-जब डीडीटी का छिड़काव होता है तो मच्छर बादल में घूमने का आनंद लेते हैं मरते नहीं बल्की खुश होकर नाचते हैं । गैस  के साथ हिल मिल गएं हैं , दोस्ती कर लिए हैं । मालूम है कि उन्हें कुछ नहीं होगा । इसमे भी कोई केमिकल लोचा है।

– धर्मेन्द्र कुमार निराला निर्मल

चाईना माल(हास्य व्यंग)

जीवन की जरूरतों को पूरा करने के लिए रोजमर्रा की चीजों को खरीदते हैं , खरीदते ही नहीं बेंचते भी हैं।  बेंचते क्या है। वह जो बिक जाए , हां जो बिक जाय।  मतलब आप भी अगर बिक जाए तो आप  भी बिकाऊ माल हैं।  भले  आपका कीमत बहुत ज्यादा हो एक आम आदमी से।  लेकिन आप भी बिकाउं हैं। लेकिन आप मानते नहीं है। आप  जितना ऊंचे  उहदे पर होते हैं,  उतना ज्यादा कीमत  आपकी लगती है। आज हर कोई जनधन खाता से जुड़ना चाहता , क्यों ? क्योंकि इसमें जनता का माल ज्यादा है । आप आसानी से चपट कर सकते हैं । सबको मालूम है आप ऐसे लिंक से जुड़ गए हैं। जिसमे हर रोज जेब गर्म हो रही है। और उस गर्मी से आपको   चिकुनगुनिया भी नहीं होती।  मजे की बात है किसी को पता भी नहीं चलता ।  आप हर रोज बिकते हैं । खरीदने  वाला आपके  पास खुद आता है । कुछ मोलभाव कर कर  खरीद लेता है।  थोड़ी गड़बड़ी होती है,  तो डाँटता है,बेईज्जत  करता है और आप हैं कि  इसे व्यापार का हिस्सा मान लिए हैं।  जब आप इसे एक व्यापार मान लेते हैं तब  बड़े स्तर पर काम करते हैं।  लोग आपको अधिक जानने लगते हैं। आपसे  ऊपर के ओहदे को  भी अब पैसों की हवा लगती है। आप ऊंचे दामों में बिकते हैं।  कोई कहता है मैं बिकता नही हूं। मतलब उसे खरीदार मिले ही नहीं। खरीदार मिले  तो दुनिया में बहुत बिकाऊ माल है लेकिन आदमी जैसा बिकाऊ  माल कोई नहीं है ।यह अपनी हिफाजत खुद करता है। 

आलू ,प्याज, बैगन ,टमाटर ,भिंडी के अलावा बहुत सारे सब्जियां  बिकती हैं। कभी  ऊंचे दाम पर,  कभी निम्न दाम पर और यहां भी मानव ही खरीदता है । भला निर्जीव चीजों को अपना कीमत क्या पता । कीमत हम ही लगाते हैं । हम बिकते हैं कभी दालों के जमाखोरी पर,  कभी प्याज की जमाखोरी कर के। कुछ लोगों का  बिकना ऐतिहासिक होता है ।उसे इतिहास के स्वर्ण अक्षरों में लिख दिया जाता है ।आम आदमी का कुर्ता तक नही बिकता वहीं बड़ी हस्ती का कच्छा तक बिक जाता है। किसी का कोट ,किसी का चश्मा।  सबसे अधिक चाइना माल में बिकने की क्षमता होती है । वह जैसे तैसे – औने पौने दाम में बिक  कर ही दम लेगा। लेकिन कब तक टिकेगा उसकी जीवनी का प्रोफाईल नहीं बना है ।कब काल  कलवित होगा और चाहने वाले को रुला कर चला जाएगा कहा नहीं जा सकता।
अंत में यह कह कर संतोष होना पड़ता है कि चलो यार चाइना माल था। लेकिन दुनिया को घोर आश्चर्य  तब हुआ जब कोरोना चाइना माल टिकाऊ  हो गया। वहीं इसके जाने का कोई निश्चित तिथि नहीं है ।

धर्मेन्द्र कुमार निराला निर्मल

कोरोना देव पधारें स्वर्गलोक से(हास्य व्यंग)


जब भारत में गो बैक कोरोना, मोमबती जलाने और ताली- थाली पीटने से कोरोना नही भागा तब मंत्रीगण गंभीर हो गए। एक निश्चित दिन सभा के आयोजन की तारीख , गोवा से हॉट कैलेंडर मंगवा कर देखा गया। शुभ  दिन आया शुक्ल पक्ष में 13 दिन अंधार जाने पर सूर्य देव के आसमान में 45 डिग्री ताप के रहने पर 25 तारीख को। महाराज का आगमन हुआ सभी चेले- चपाटीयों ने  उच्च ध्वनि विस्तारक यंत्र से  जय जयकार लगाया , महाराज की जय । महाराज ने इशारा किया सभी मंत्रीगण आसन पर बैठ गए । थोड़ी देर बाद एक गंभीर और मोटा आदमी खड़ा हुआ। देख कर ऐसा लगता ,  अगर उस पर कोई मुसीबत फेंकी जाए तो वह अपने पेट से ही रोक लेगा।   वह बोला – महाराज कोरोना राक्षस हमारे जनता को निगल रहा है । इसका अत्याचार रोका नहीं गया तो हमारे परिवार नियोजन के सभी योजना धरे के धरे रह जाएंगे ।  आप  परिवार नियोजन के  पोस्टर पर नजर आएंगे और तब  हमे अपने विकास की गाथा ,विकास रथ से प्रचार करना पड़ेगा। इधर भोंपा से मधुर संगीत सुनाई दे रहा था, दिल ढुढ़ता है फुर्सत के रात दिन । गीत सुनकर मन वाह कि जगह आह भर रहा था-नही चाहिए अब फुर्सत के रात-दिन। कैसा समय आ गया,  दिल था जो मानता ही नही था अब मान गया है।  कोरोना से दिल के मरीज का भी पता चला है। जो आशिक बेचैनी ,बेकरारी, तन्हाई से नही डरते थे वो कोरोना से डर रहें हैं। दिल का आलम सभी का एक ही जैसा है। ऐसा पहली बार हुआ है जब सामने वाले से पुछने वाले का हाल मिला है। लेकीन कोरोना का स्टेटस किसी का किसी  देश से नही मिल रहा है।ईधर  महाराज गंभीर  मुद्रा को तोड़कर फिर गंभीर हो गएं, फिर बोलें – इसे रोकने का क्या उपाय है।  सभा में उपस्थित राजगुरु ने कहा –  हमारे देश में पहले से ऐसे कई बीमारीयों का प्रकोप हुआ है ।  कुछ राक्षसों ने मानव को परेशान किया है तब उस समय यंज्ञ करने से  सभी संकटों का समाधान हो जाता था। देवता गण हमारी रक्षा करते थे। महाराज  खुश होकर बोले- तब ऐसा ही हो।  नारद जी  पृथ्वी पर भ्रमण के लिए आए तो देखा ,  हर घर में हवन हो रहा है । वे  भागे- भागे  इंद्रदेव के पास गए और  कान भर  दिए  नारायण – नारायण एक गरीबी से उठकर राजा बना मनुष्य अपनी प्रसिद्धि और इंद्रलोक के लिए यज्ञ कर रहा रहा है । अगर उसे रोका नहीं गया तो आपकी लोक  भी जीत  लेगा  और जनता सहस्त्र समर्थन कर देगी। यह सुनकर इंद्रदेव क्रुध हुए । उन्होंने मेघ देवता से बारिस बरसाने को कहा।  सभी हवन कुंड पानी में बह गए। चारो तरफ जल ही जल। जल ही जीवन है कि जगह जल ही प्रलय हो गया।  देवताओं के गुरु बृहस्पति ने कहा – मानव  कोरोना  के समाधान के लिए यज्ञ  कर रहा है ,मूर्ख! तब तक सड़को पर नाव चल रही थी।   सभी देव विष्णु भगवान के पास गए उन्होंने अपने शक्ति से कोरोना देव को निर्मित किया ।  कोरोना देव घेंघे की सवारी कर स्वर्ग लोक से प्रस्थान कर दिएं है। आशा है नया साल तक जरूर पहुँच जाएंगे।

 – धर्मेन्द्र कुमार निराला निर्मल

कुछ करो ना !(हास्य व्यंग)

मैने कहा कि कोरोना चीन से आया है तो कुछ शादी-शुदा  दंपति कहने लगे यह  तो इंडिया में आदि काल से था ।  इसका नाम ऐसे वहां बदल गया जैसे भारत इंडिया में ,इलाहाबाद  प्रयाग में । भारत में इसका नाम ‘कुछ करो ना’  था । चाईना  में कोरोना हो गया । लेकीन  दबंग चाइना  यह स्वीकारने से कतरा रहा है कि हमारे यहां से  कोरोना फैला है ,उल्टे अमेरिका पर आरोप लगा रहा है । ऐसे में भारत कैसे कह दे की यह  बीमारी  भारत में  आदी काल से था । हमने रोक लगाने कोशिश की । एक बार हमारे राजीव गांधी जी किए थे लेकिन असर उल्टा हुआ , इसके विपरीत और फैल गया पूरे भारत में  । कई धार्मिक कट्टरपंथी लोगों ने कहा,  यह  हमारे फिलासफी पर खतरा  है तो भारत सरकार ने कई देशी चलचित्र नायक – नायिकाओं से सम्पर्क किया, कि जन  जागरूकता लाया जाए,  डिलक्स भी बड़े काम की चीज है , बताया जाए; जब सब ने गर्दन नीचे कर ली , विदेशी को देशी  बनाकर पेश किया गया ।  कहीं जनता इसका विरोध ना कर दें कि अंग्रेजों का नया पैंतराबाजी है।   फूट डालो और शासन करो की जगह इनका नया फाॅर्मूला रिडियूस करो और शासन करो तो नही है। कोरोना और कुछ करोना में ज्यादा फर्क नही है। यहां हर काम बंदा पहले मना कर देता है।वह  निक्मा बैठना पसंद करता है।

भारतेन्दु हरिचन्द्र ने कहा है।   विलायत में मालिक जब काम करने जाते हैं तब उनका ड्राइवर अखबार पढ़ता है। देश का जागरूक नागरिक है। देश में क्या हो रहा है इसका ध्यान रखता है, यहां मालिक गए काम से ड्राइवर बैठकर ताश खेलते हैं ,गप मारते हैं। ऐसे में देश की तरक्की कैसे होगी लेकिन भारतीय नारीयों को मालूम है ।पतियों    से कैसे काम निकलवाना है ।उनका हथियार है , कुछ करो ना !  पति बेचारा सोचता है कुछ ही तो करना है , कर देते हैं लेकिन करते-करते जब उसे एहसास होता है कि उसका  इस्तेमाल किया जा रहा है ।

तभी बीबी बोलती है , थोड़ी सी बची है । आज तुम्हारे लिए   गाजर का हलवा बना दुंगी ,  पति बेचारा खुश।पति बाजार नहीं जाना  चाहता, शाॅपिंग नही करना चाहता लेकिन कुछ करोना  से शुरू होकर सारा काम खत्म हो जाता है। भारतीय पति थोड़ा भोले होते हैं । बाजार में पत्नी मटर की तरफ इशारा करती है और पुछती है,  दो किलो मटर  ले लूं। पति महोदय बोलते हैं , ले लो । तो फिर पत्नी को अपने  भोले पति पर हंसी आती है। दया कर हकीकत बता देती हैं कि मतलब  कहना चाहती हूँ , इतना छिल लोगे ना ! वैसे कोरोना वायरस बहुत कुछ लेकर जाएगा तो  बहुत  कुछ देकर भी जाएगा ।  साफ हवा, साफ पानी , साफ मौसम और बहुत बीमारीयों से  राहत । भारत मे कुछ  करोना बीमारी खत्म हो जाएगा क्योंकि छः- सात महिनो मे पतियों को घर का काम करने कि आदत पड़ जाएगी फिर लुगाइयो को निवेदन नहीं करना पड़ेगा , कुछ  करो ना!

–धर्मेन्द्र कुमार निराला निर्मल

सहिजन(एक प्रेम कहानी)

अठारह साल का एक लड़का बाजार में पालक बेच रहा था। तभी उसके कानों में एक आवाज  बाएं तरफ से आई।  एक लड़की ग्राहक से  सहिजन खरीदने के लिए प्रार्थना कर रही थी। बहुत विनती  करने पर ग्राहक ने सहिजन खरीद लिया लेकिन फिर वापस करने लगा ।वह तुरंत बोला- मेरे पास छुट्टे हैं। ले लो! उस दिन से दोनों एक- दूसरे को जानने लगे  फिर बातों का सिलसिला शुरू हुआ । क्या नाम है । सुनिधि ! बहुत सुंदर नाम है! आपका  क्या नाम है !  रघु ! बहुत अच्छा नाम है। लेकिन तुमने कहा था ? क्या नाम भी सुंदर होता है ।दोनों हंस पड़े । हां ,लेकिन पता नहीं क्यों मैंने भी कह दिया, अच्छा नाम है  ! जिंदगी की मुश्किलों के बावजूद जब दोनों बाजार में मिलते ,तब  अपने कठिनाइयों को भूल जाते और वही  एक समय था । जब  दोनों के चेहरे पर खुशी रहता । लेकिन घर जाते ही  दुखों का पहाड़ टूट पड़ता । सुनिधि तीन बहनो  में बड़ी थी। उसे एक छोटा भाई भी था। उसकी माँ दो साल पहले प्रश्व पीड़ा से  मर गई थी । वह अपने छोटे भाई को बहुत प्रेम करती थी।बाजार से उसकी पसंद  के चीज प्रतिदिन जरूर लाती थी ।उसका पिता दिहाड़ी मजदूर था। वह अपने पैसों को शराब पर खर्च कर देता था।कभी -कभी तो छोटे- मोटे गलतियों के लिए अपने बेटियों को बेरहमी  से पिटता था। सुनिधि को सुबह से देर रात तक काम करना पड़ता । वह सुबह ही  दूसरों के खेतों में काम करने के लिए निकल जाती थी। फिर शाम को जल्दी आ कर बाजार  चली जाती थी। आज रघु खुश था। उसे पता नहीं , क्यों अधिक  खुशी  हो रही थी। उसके माँ ने कहा था,अपने आसपास सब्जी बेचने वालों को भी मिठाई खिला देना। रास्ते में ही वह एक किलो गुलाब जामुन खरीद लिया था । आज बहुत खुश लग रहे हो । हाँ, आज मेरा जन्मदिन है ।फिर उसने मिठाई का डब्बा उसके आगे बढ़ा दिया। लेकिन सुनिधि सोचती रही।

 रघु ने अपने हाथ से उठाकर उसे मिठाई दिया लेकिन शर्म से वह कुछ बोल नहीं पाई। उसने सबको  मिठाई खिलाया । पहली बार बाजार में जन्मदिन का मिठाई
कोई खिला रहा था ।अब क्या ,उस दिन से हर रोज किसी का जन्मदिन मनता ।उस छोटे से पूंजी से उनका दिल बड़ा था ।वे सभी एक -दूसरे को प्यार बांटने लगे ।  चाँद बादलों में लुका-छुपी खेल रहा था और रह- रह के चाँदनी चारों तरफ बिखेर रहा था। वह पुआल से बनी  चटाई पर लेटे  चांद को निहार रही थी । चांद के काले- काले धब्बे ,उसे खंडहर जैसे लगे । उसे लग रहा था , रघु उसी में छिपा है ।और वह उसे बुला रहा है। आधी रात बीत चुका था । वह बार-बार करवट बदल रही थी। वह रघु को उपहार देना चाहती थी लेकीन क्या दे , वह यही  निर्णय नही कर पा रही थी।  अचानक उसके दिमाग में एक विचार आया और वह खुशी से मुस्कुरा दी । रघु को उसने देखा, वह पालक के अलावा हरी मिर्च भी बेच रहा था । वह अपनी जगह पर जाकर बैठ गई।  वह बार-बार रघु को देख रही थी।  रघु अपने ग्राहकों में व्यस्त था। रघु का ध्यान उसकी तरफ गया और उसने सक- पका कर अपनी मुंह घुमा लिया । आज वह उससे बातें करना चाहती थी लेकिन समझ नहीं आ रहा था ।क्या बोले ?वह सोच रही थी , पालक का दाम पूछे, नही -नही !  कभी सोचती मिर्च का दाम पुछे-  नहीं -नहीं  ! यह छोटी – छोटी     बातें तो हर रोज पुछा  करती है ।तभी  एक ग्राहक – सहिजन कैसे केजी है ? तीस रूपये ! फिर सोच में पड़ गई । बाजार खत्म हो रही थी। रघु का सब्जी पहले ही बिक गया था। वह जाने लगा । यह  देखकर उसने भी आवाज लगाई । रघु मैं भी चलती हूँ। रास्ते में रघु ने पूछा आज तुम उदास  क्यों  हो ? नही,  मैं उदास कहाँ हूँ । सच बताओ!  तुम्हारा सहिजन बिक गया ।वह कहना चाहती थी ,हाँ। लेकिन उसे डर था ,कहीं वह टोकरी ना  देख ले । वह बोली – नही ।  रघु अपने जेब से बीस रूपये निकाल कर देने लगा । लो अपने छोटे भाई के लिए मिठाई खरीद लेना ।नही -नही रहने दो । वह  तुम्हे जितना प्यारा है , मेरे लिए भी है ।  इस बार वह मना नहीं कर सकी। उसके नयन सजल हो गये लेकिन छुपाते हुए, उसने  टोकरी से गिफ्ट निकाला और उसे दे दिया । हँस के बोली – जन्मदिन मुबारक हो ।  फिर दोनो हँसने लगे । बेटा आज जल्दी आ गए ।हाँ माँ, टोकरी रखते हुए उसने कहा। माँ पास आकर टोकरी से बोरे  को अलग किया । यह क्या है ?  माँ , सुनिधि ने दिया है । कल मेरा जन्मदिन था न । इसलिए आज उसने गिफ्ट दिया है।   सुनिधि कौन है ? माँ, पास के गाँव की लड़की है ।मेरे साथ ही  सब्जी बेचती है  , बहुत गरीब है , उसकी माँ नही है , वह एक ही सुर में बोला जा रहा था कि माँ ने  कहा, बस रहने दे । एक माँ , एक माँ  नहीं होने का दर्द समझ  सकती है बेटा ! खोल कर देख , क्या है । माँ  इसमें गुलाब का डंठल है । यह  कैसा गिफ्ट है , माँ ! पौधा होता तो लगा देता। इसे फेंक दूं माँ। नही ! , नही ! हाँ , यह बहुत शानदार गिफ्ट है बेटा!  माँ के कहने  पर  घर के आंगन में  उसने उसे लगा दिया।

 रघु और सुनिधि अच्छे दोस्त हो गए थे। सुनिधि कभी-कभी पर्व त्योहारों में उसके घर जाती थी।  रघु की माँ  उसके  लिए खास चीज बनाती । उसके मना करने पर भी उसे जबरदस्ती खिलाती । रघु कई दिन से उदास था क्योंकि सुनिधि बाजार नहीं आ रही थी । एक दिन वह उसके घर चला गया। सुनिधि   अपने घर के पास छोटे से   गुमटी में किराने की सामान बेच रही थी। रघु को देखकर उसने  कहा-  मैं कई दिन से तुम्हारे घर आना चाहती थी लेकिन समय नहीं मिल रहा था। रघु  अभी तक उसे साधारण कपड़ों में देखा था ।आज वह बहुत सुंदर लग रही थी ।उसे लगता था, बागो के बीच कोई परी बैठी है और चीजों को नहीं बल्कि अपने प्यार और स्नेह बांट रही है ।उसकी आवाज बहुत मीठी लग रही थी। उसके कानों में  बाली , खुशी से झूम रहे थे ।  उसके  हाथों की मेहंदी उसके मन को मजबूर कर रहे थे।

आज उसे वह युवती और समझदार लग रही थी। आंटी  कैसी हैं ।  आवाज सुनते ही उसका ध्यान टूटा । अच्छी हैं । तुम बाजार क्यों नहीं आ रही हो। पापा ने कहा  है कि मैं बड़ी हो गई हूँ ।  इसलिए मैं बाजार नहीं जा सकती । अब मेरी  छोटी बहन जाएगी । क्या नाम है उसका ? सृष्टि । दोनों चाय पीने लगे । जाते-जाते उसने ,उसके मां के लिए मिठाई दिया और वह बोली -आंटी से कह देना ,  मैं अच्छी हूँ । रघु का अब मन नहीं लगता । उसकी आँखे  उसे बाजार में उसे ढूंढती रहती । वह उसकी बहन से उसके बारे में पूछता  रहता । जिससे थोड़ा उसके दिल को चैन मिलता था।  सुनिधि  भी रघु  के बारे में अपने बहन से पूछती रहती थी । उसे लगता था । वह है जो उसके प्यार को समझ सकता है । जो मेरे भाई से प्यार कर सकता है । मुझसे  भी उतना ही प्यार करेगा । एक दिन   सृष्टी ने  कहा कि अगले सोमवार को दीदी का जन्मदिन है । दीदी ने बुलाया है । अब वह  पहले से बहुत ही खुश रहने लगा था।  रघु का उत्साह जैसे -जैसे समय करीब आ रहा था । वैसे -वैसे  बढ़ रहा था।  उसे खुशी से नाचने का जी कर रहा था।  वह दौड़कर उसके   घर चले जाना चाहता था । आज सुनिधि का जन्मदिन था।  उसे ऐसा लग रहा था।  जैसे हवा में उड़ रहा है और वह अब बादल को छू लेगा।  खुशी उसके चेहरे पर साफ दिखाई दे रही थी।  उसका ललाट चमक रहा था। जब वह उसके घर पहुंचा तो पहले से बहुत से लोग आए थे । सुनिधि ने उसके हाथ के गिफ्ट को  देखा।  वह समझ गई । प्यार कोई संसारिक चीज नही है । तभी तो उससे इतनी  खुशबू आती है । जो ह्दय मे  बंद है।  कुछ नहीं कहता।  कुछ नहीं बोलता । फिर भी महकता है । तो फिर गुलाब की खुशबू चार दीवारों में कैसे कैद रह  सकती है। वह  जान चुकी थी , जो गुलाब का डन्ठल उसने दिया था । अब वह गुलाब हो चुका है। उसका प्रेम  वर्षो तक सर्दी-गर्मी,बारिष और  आंधी -तुफान मे  , प्रकृति के सभी परिस्थियों  मे पलकर और जिंदगी के सभी मुश्किलो को सहकर उसके सामने है । वह सोचने  लगी क्या करे। उसके आंखों मे अश्रु आ आगे ।   लेकीन जल्दी से उसने  अश्रु छुपा लिया और  कमरे मे चली गई । फिर हिम्मत करके आई । सभी के सामने  केक काटी।  कमरे में बैठकर दोनों बातें करने लगे तभी रघु ने उसे गिफ्ट दिया । उसने पूछा- इसमें क्या है? वर्षो का  सरप्राइज है । समझो तुम्हारा ही गिफ्ट है । मैं कुछ नहीं समझी । तभी रघु की नजर  आलमारी में रखी गिफ्ट पर गई।  उसने पूछा – यह गुलदस्ता किसने दिया है । बहुत खूबसूरत गुलाब लगे हैं । उसने उठा लिया , बहुत खुशबू आ रही है।  वह कैसे कह दे । यह खुशबू बनावटी है । जो क्षण भर में खत्म हो जाएगी । असली खुशबू तो  तुम्हारे गुलाब में है।  अच्छा बताओ , किसने दिया है । मेरे मंगेतर ने ! क्या ? हाँ , मेरी सगाई हो गई है । यह सुनते ही रघु का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।  उसके चेहरे पर पसीना आने लगा । वह वहाँ से भाग जाना चाहता था । तभी उसने कहा , मैं समझ  सकती हूँ , तुम क्या कहना चाहते हो । मैं तुम्हारे प्यार को समझती हूँ। लेकिन तुमने  पहले कभी नहीं बताया । वह कुछ नहीं सुनना चाहता था। उसने पूछा , क्या तुम मुझसे प्यार करती हो । बाहर लोग मस्ती कर रहे थे। बहुत शोर हो रहा था। वह कुछ बोल ना सकी । रघु उठकर घर चला आया और कमरा बंद कर रोने लगा । सुबह उगते सूरज की रोशनी में उसने देखा गुलाब के फूल चारों तरफ सुगंध  फैला रहे थे । वह पौधों को पानी देने लगा।   अगले दिन सुनिधि ने  पैकेट खोला,  देखा एक बहुत बड़ा गुलाब था और उसने  एक ग्रीटिंग कार्ड पर अपने हृदय को  रख दिया था।
धर्मेन्द्र कुमार निराला निर्मल

 

प्रेरणादायक विचार 3

जे कृष्णमूर्ति विश्वविख्यात दार्शनिक तथा आध्यात्मिक विषयों के लेखक थे। वे माता-पिता की आठवीं संतान थे, इसलिए उनका नाम कृष्ण के नाम पर रखा गया ।जे कृष्णमूर्ति मानसिक क्रांति, ध्यान और समाज में सकारात्मक परिवर्तन और बुद्धि की प्रकृति जैसे विषयों की गहरी समझ रखते हैं। 1927 में एनी बेसेंट ने उन्हें विश्वगुरु घोषित किया। लेकिन दो वर्ष बाद ही वे थियोसाॅफिकल विचारधारा से दूर हो गए और फिर उन्होंने एक नए दृष्टिकोण का प्रतिपादन किया ।

जे कृष्णमूर्ति

जन्म : 12 मई, 1895   

अवसान: 17 फरवरी, 1986

* जीवन के किसी एक हिस्से को जानने के बजाय पूरे जीवन की समझ होना जरूरी है। इसके लिए आपको पढ़ना चाहिए, आकाश की ओर देखना चाहिए, नाचना-गाना चाहिए, कविताएं लिखना, महसूस करना और समझना चाहिए। बस यही सब जीवन है ।

  • आंतरिक अनुशासन आवश्यक है, बाह्य अनुशासन मन को मूर्ख बना देते हैं और नकल करने की प्रवृत्ति लाते हैं ।
  • एक विचार इतना धूर्त और चालाक होता है कि अपनी सुविधा के लिए वह सब कुछ बदल देता है ।
  • असल मायने में सीखना तब शुरू करते हैं, जब हम हमारी प्रतियोगिता की भावना त्याग देते हैं
  • हर व्यक्ति के भीतर एक दुनिया समाई होती है ।यदि  आप जानते हैं कि कैसे उसे देखना है और सीखना है तो उसका दरवाजा और चाबी आपके हाथ में है। आपके सिवा दुनिया में कोई भी आपको  उस द्वार और चाबी को नहीं सौंप सकता।
  • हमें आजादी सत्य से मिलती है, न कि आजाद होने की कोशिशों से।
  • स्वयं को न जानना ही अज्ञानता है ।ज्ञान हासिल करने की शुरुआत खुद को जानने से होती है ।
  • एकांत में रहना सुंदर अनुभूति है। हालांकि एकांत में रहने का अर्थ अकेले होना नहीं है ,बल्कि मस्तिष्क को समाज द्वारा प्रभावित और प्रदूषित होने से बचाए रखना है।

    —साभार: दैनिक भास्कर

मोटापे का दर्द(हास्य व्यंग)

मोटापे के प्रमुख कारणों में डिप्रेशन , जीवनशैली में बदलाव , अधिक भोजन और शारीरिक श्रम कम करना है। मोटापे के कारण ब्लड प्रेशर ,शुगर और पेट की बीमारियाँ अधिक होती है। और भी तरह-तरह की बीमारियाँ हैं ।लेकिन मोटापे का दर्द ऐसा है, जो सबसे अधिक होता है ।बाहर निकलो तो मन में सहानुभूति  होती है, कहीं कोई जीव ना दब  कर मर जाय।  रिक्शा  करते हैं तो रिक्शा वाले पर दया होती है-  कहीं बेचारे की हड्डी पसली टूट कर बिखर ना जाए ।लेकिन जब किराए की बात आती है ।तो मोटा आदमी टूटता है ।उसकी अंग-अंग  ढीले पड़ जाते हैं । और हाथी जैसा आदमी खुद से हल्का होने की कसमें खाता है। मोटे व्यक्ति को भी अपने बॉडी  के फायदे हैं । वह हवा में उड़ नहीं सकता । कम से कम तो कोई  निखतू   दोस्त तो नही कहेगा, आजकल बहुत  हवा में उड़ रहे हो ।अगर बीवी मोटी हो और गीतकार की बात माने तो बिस्तर पर लिटा तो गदे  की जरूरत नहीं पड़ेगी । मोटे आदमी को चैन कहीं  नहीं है ।उसे उठने- बैठने में दिक्कत ।कहीं जाता है, तो कोई कुर्सी ही नहीं मिलती है कि वह बैठे। अगर बैठे तो कुर्सी टूटने का डर।उसके नाप के कपड़े नहीं मिलता है । कभी-कभी टॉयलेट के दरवाजे पर खड़े मोटे व्यक्ति को धर्मराज उसके पापों के लिए यातना दे रहें है ।उसे ऐसा फीलिंग होती है। और वह क्षमा मुद्रा में हाथ जोड़े ,पैरों को मोड़कर दीवार से चिपक जाता है कि अब दिवार  ही इस  दारुण कष्ट के क्षण में उसका साथी है ।दिवार ही मनुष्य की विरह वेदना में अकेलापन में आंधी , बारिस- तूफान  और दुश्मनों के रक्षा में काम आता है ।जीवन के डूबती नैया को दिवार, अमिताभ को सहारा दिया था ।सबसे अधिक काम का चीन का दिवार  रहा है। जो हर मुश्किल में  अपने देशवासियों का रक्षा करता रहा है। लोग शादी के लिए खाते पीते घर का वर ढूंढते हैं ।मोटा व्यक्ति ही   ऐसे वर का प्रमाण है। इससे बेहतर कोई सबूत नहीं हो सकता ।क्योंकि मोटापा भी खाते -पीते घर की निशानी है। एक मोटा व्यक्ति होता  है ।जो चिंतित रहता  है ।उसे कहा जाता है ।क्यों टेंशन में हो ।चिंता मत करो यार -डोंट वरी लेकिन बंदा पलट कर बोलता है ।मैं चिंतित कहां हूँ । लेकिन मोटा व्यक्ति अपना दु:ख छुपा नहीं सकता ।इसलिए हर कोई मोटापा दूर करने का नुक्सा बताते रहता है। वह पास बैठे लोगों का भाषण सुनता रहता है ।जब कान पक जाता है। चुपके से उठ जाता है।सबसे ज्यादा लेक्चर तो घर में खाने पीने के परहेज पर होती है। कहीं कुछ मिठाई खाया कि हो हल्ला होने लगती है  । मिठाई  खाया नही कि घर पर बेचारे को डांट सुननी पड़ती है  कि ओ हवा मिठाई की तरफ फूल जाओगे लेकिन चिपक नही  सकते समझे और फिर वह बेचारा चुप । हर कोई मोटा भाई नहीं बन सकता। शहर के दिवार पर इश्तेहार लगा रहता है। मोटापा तीन महीने में छूमंतर। अखबार में विज्ञापन आता है। जिसमें एक महिला हाथ में फीता लेकर कमर नापती है ।वह स्लिम बॉडी- जीरो फिगर का कैप्सूल बेचती है । कई लोग टीवी पर तेल बेच रहे हैं। देश के युवा दण्ड – पेल से थक गए हैं ।वह कोई मोटापा दूर करने के लिए पंतजलि प्रोडक्ट चाहते हैं। कई बार उनका पेंट फट जाता है। उनका बार-बार बाबा से कनेक्शन कट जाता है ।बाबा बार-बार कहते हैं, करने से होता है। जबकि युवाओं का  कहना है ।इसी कारण देश का जीडीपी घट गया है  बाबा ! सबसे ज्यादा तो उसकी पत्नी आतंकित रहती है कि कहीं  गिर गए तो मेरी सांस  ही निकल जाएगी हे राम!

—- धर्मेन्द्र कुमार निराला निर्मल

प्रेरणादायक विचार 2

महर्षि वाल्मीकि आदि काव्य ‘रामायण’ के रचयिता हैं। पौराणिक कथानुसार, ऋषि बनने से पूर्व  वे दस्यु थे।

 एक साधु से भेंट के बाद उन्होंने पापकर्म छोड़ दिया और तपस्या में लीन हो गए ।एक बार उन्होंने  तमसा नदी के तट पर क्रीड़ारत  क्रौञ्च युगल को देखा ,इनमें से एक को व्याध ने बाण से मार दिया ।तब  वाल्मीकि के हृदय से  शोक की अभिव्यक्ति के रूप में एक श्लोक फूट पड़ा ।उसके बाद ब्रह्मा जी की प्रेरणा से उन्होंने आदिकाव्य ‘रामायण’ की रचना की।


 *  उत्साह ही बलवान होता है । उत्साह  से बढ़कर दूसरा कोई बल नहीं है । उत्साही  व्यक्ति के लिए  इस संसार में कोई वस्तु दुर्लभ नहीं है ।

*  राजा जो कार्य करता है, प्रजा उसी का अनुसरण करती है ।

  • जिन लोगों की आयु समाप्त हो जाती है, वे जीवन के अंतकाल में मित्रों द्वारा कही गई हितकर बातें भी नहीं मानते हैं।
  • शोक व दुख इस संसार में  शौर्य को नष्ट करने वाले होते हैं ।
  • बीते समय के साथ शोक स्वयं दूर हो जाता है ।
  • काल का विधान सबके लिए दुर्लंघ्य होता है ।
  • सदाचार ही  सज्जनों का आभूषण  होता है ।
  • पापकर्म का फल अवश्य मिलता है ।
  • शोक में डूबे व्यक्ति को सुख नहीं मिलता है ।
  • मधुरभाषी लोग तो बड़ी आसानी से मिल जाएंगे, किंतु जो सुनने में अप्रिय, लेकिन परिणाम में हितकर हो ऐसी बात कहने और सुनने वाले लोग दुर्लभ होते हैं।
  • मनस्वी लोगों का कहना है कि सलाह या परामर्श ही विजय का मूल है।
  • संचय  का अंत विनाश है , उत्थान  का अंत पतन,  संयोग का अंत वियोग और जीवन का अंत मृत्यु है।



    साभार : दैनिक भास्कर,   श्रीमद् वाल्मीकीय  रामायण( एक आर्ष महाकाव्य )

    टिप्पणीकार :  डॉ भीमराज शर्मा शास्त्री

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