कुछ करो ना !(हास्य व्यंग)

मैने कहा कि कोरोना चीन से आया है तो कुछ शादी-शुदा  दंपति कहने लगे यह  तो इंडिया में आदि काल से था ।  इसका नाम ऐसे वहां बदल गया जैसे भारत इंडिया में ,इलाहाबाद  प्रयाग में । भारत में इसका नाम ‘कुछ करो ना’  था । चाईना  में कोरोना हो गया । लेकीन  दबंग चाइना  यह स्वीकारने से कतरा रहा है कि हमारे यहां से  कोरोना फैला है ,उल्टे अमेरिका पर आरोप लगा रहा है । ऐसे में भारत कैसे कह दे की यह  बीमारी  भारत में  आदी काल से था । हमने रोक लगाने कोशिश की । एक बार हमारे राजीव गांधी जी किए थे लेकिन असर उल्टा हुआ , इसके विपरीत और फैल गया पूरे भारत में  । कई धार्मिक कट्टरपंथी लोगों ने कहा,  यह  हमारे फिलासफी पर खतरा  है तो भारत सरकार ने कई देशी चलचित्र नायक – नायिकाओं से सम्पर्क किया, कि जन  जागरूकता लाया जाए,  डिलक्स भी बड़े काम की चीज है , बताया जाए; जब सब ने गर्दन नीचे कर ली , विदेशी को देशी  बनाकर पेश किया गया ।  कहीं जनता इसका विरोध ना कर दें कि अंग्रेजों का नया पैंतराबाजी है।   फूट डालो और शासन करो की जगह इनका नया फाॅर्मूला रिडियूस करो और शासन करो तो नही है। कोरोना और कुछ करोना में ज्यादा फर्क नही है। यहां हर काम बंदा पहले मना कर देता है।वह  निक्मा बैठना पसंद करता है।

भारतेन्दु हरिचन्द्र ने कहा है।   विलायत में मालिक जब काम करने जाते हैं तब उनका ड्राइवर अखबार पढ़ता है। देश का जागरूक नागरिक है। देश में क्या हो रहा है इसका ध्यान रखता है, यहां मालिक गए काम से ड्राइवर बैठकर ताश खेलते हैं ,गप मारते हैं। ऐसे में देश की तरक्की कैसे होगी लेकिन भारतीय नारीयों को मालूम है ।पतियों    से कैसे काम निकलवाना है ।उनका हथियार है , कुछ करो ना !  पति बेचारा सोचता है कुछ ही तो करना है , कर देते हैं लेकिन करते-करते जब उसे एहसास होता है कि उसका  इस्तेमाल किया जा रहा है ।

तभी बीबी बोलती है , थोड़ी सी बची है । आज तुम्हारे लिए   गाजर का हलवा बना दुंगी ,  पति बेचारा खुश।पति बाजार नहीं जाना  चाहता, शाॅपिंग नही करना चाहता लेकिन कुछ करोना  से शुरू होकर सारा काम खत्म हो जाता है। भारतीय पति थोड़ा भोले होते हैं । बाजार में पत्नी मटर की तरफ इशारा करती है और पुछती है,  दो किलो मटर  ले लूं। पति महोदय बोलते हैं , ले लो । तो फिर पत्नी को अपने  भोले पति पर हंसी आती है। दया कर हकीकत बता देती हैं कि मतलब  कहना चाहती हूँ , इतना छिल लोगे ना ! वैसे कोरोना वायरस बहुत कुछ लेकर जाएगा तो  बहुत  कुछ देकर भी जाएगा ।  साफ हवा, साफ पानी , साफ मौसम और बहुत बीमारीयों से  राहत । भारत मे कुछ  करोना बीमारी खत्म हो जाएगा क्योंकि छः- सात महिनो मे पतियों को घर का काम करने कि आदत पड़ जाएगी फिर लुगाइयो को निवेदन नहीं करना पड़ेगा , कुछ  करो ना!

–धर्मेन्द्र कुमार निराला निर्मल

प्रेरणादायक विचार 4

एल्बर्ट ग्रीन हबर्ड अमेरिकन लेखक, प्रकाशक और कलाकार भी थे । हडसन के इलिनाॅइस में पले-बढ़े  थे । उन्होंने बहुत कम उम्र में  ही लार्किन सोप कंपनी में ट्रैवलिंग सेल्समैन बनकर   सफलता प्राप्त कर ली थी

 जन्म: 19 जून 1856

 निधन : 7 मई 1915

  • सपने पूरे होते हैं जीद , दृढ़ता, समर्पण, जूनून, अभ्यास और श्रम के जादू से । हफ्तों तक नहीं, सालों तक एक-एक कदम चलकर हासिल होंगे ।
  • जहां बच्चों के लिए माता-पिता बहुत ज्यादा करते हैं, वहां बच्चे खुद के लिए ज्यादा कुछ नहीं कर पाते।
  • जीवन मे बहुत लोग  असफल होते हैं। इसलिए नहीं कि उनके पास दिमाग या काबिलियत नहीं है, बल्कि इसलिए कि उन्होंने अपनी शक्तियों को अपने लक्ष्य के आसपास व्यवस्थित ही  नहीं किया ।
  • जो  केवल इंतजार करते हैं , उन तक हर चीज बहुत देर में पहुंचती है ।
  • जिसे हम भगवान का न्याय कहते हैं  वो इंसान का इरादा है  जिसे इस्तेमाल करता, अगर वह खुद भगवान होता।
  • प्रेम बांटने से बढ़ता है।  जिस प्रेम को हम बांटते हैं उसी को हम अपने पास रखते हैं । प्रेम को बनाए रखने का एक ही तरीका है इसे बांटना।

सहिजन(एक प्रेम कहानी)

अठारह साल का एक लड़का बाजार में पालक बेच रहा था। तभी उसके कानों में एक आवाज  बाएं तरफ से आई।  एक लड़की ग्राहक से  सहिजन खरीदने के लिए प्रार्थना कर रही थी। बहुत विनती  करने पर ग्राहक ने सहिजन खरीद लिया लेकिन फिर वापस करने लगा ।वह तुरंत बोला- मेरे पास छुट्टे हैं। ले लो! उस दिन से दोनों एक- दूसरे को जानने लगे  फिर बातों का सिलसिला शुरू हुआ । क्या नाम है । सुनिधि ! बहुत सुंदर नाम है! आपका  क्या नाम है !  रघु ! बहुत अच्छा नाम है। लेकिन तुमने कहा था ? क्या नाम भी सुंदर होता है ।दोनों हंस पड़े । हां ,लेकिन पता नहीं क्यों मैंने भी वह कह दिया, अच्छा नाम है  ! जिंदगी की मुश्किलों के बावजूद जब दोनों बाजार में मिलते ,तब  अपने कठिनाइयों को भूल जाते और वही  एक समय था । जब  दोनों के चेहरे पर खुशी रहता । लेकिन घर जाते ही  दुखों का पहाड़ टूट पड़ता । सुनिधि तीन बहनो  में बड़ी थी। उसे एक छोटा भाई भी था। उसकी माँ दो साल पहले प्रश्व पीड़ा से  मर गई थी । वह अपने छोटे भाई को बहुत प्रेम करती थी।बाजार से उसकी पसंद  के चीज प्रतिदिन जरूर लाती थी ।उसका पिता दिहाड़ी मजदूर था। वह अपने पैसों को शराब पर खर्च कर देता था।कभी -कभी तो छोटे- मोटे गलतियों के लिए अपने बेटियों को बेरहमी  से पिटता था। सुनिधि को सुबह से देर रात तक काम करना पड़ता । वह सुबह ही  दूसरों के खेतों में काम करने के लिए निकल जाती थी। फिर शाम को जल्दी आ कर बाजार  चली जाती थी। आज रघु खुश था। उसे पता नहीं , क्यों अधिक  खुशी  हो रही थी। उसके माँ ने कहा था,अपने आसपास सब्जी बेचने वालों को भी मिठाई खिला देना। रास्ते में ही वह एक किलो गुलाब जामुन खरीद लिया था । आज बहुत खुश लग रहे हो । हाँ, आज मेरा जन्मदिन है ।फिर उसने मिठाई का डब्बा उसके आगे बढ़ा दिया। लेकिन सुनिधि सोचती रही।

 रघु ने अपने हाथ से उठाकर उसे मिठाई दिया लेकिन शर्म से वह कुछ बोल नहीं पाई। उसने सबको  मिठाई खिलाया । पहली बार बाजार में जन्मदिन का मिठाई
कोई खिला रहा था ।अब क्या ,उस दिन से हर रोज किसी का जन्मदिन मनता ।उस छोटे से पूंजी से उनका दिल बड़ा था ।वे सभी एक -दूसरे को प्यार बांटने लगे ।  चाँद बादलों में लुका-छुपी खेल रहा था और रह- रह के चाँदनी चारों तरफ बिखेर रहा था। वह पुआल से बनी  चटाई पर लेटे  चांद को निहार रही थी । चांद के काले- काले धब्बे ,उसे खंडहर जैसे लगे । उसे लग रहा था , रघु उसी में छिपा है ।और वह उसे बुला रहा है। आधी रात बीत चुका था । वह बार-बार करवट बदल रही थी। वह रघु को उपहार देना चाहती थी लेकीन क्या दे , वह यही  निर्णय नही कर पा रही थी।  अचानक उसके दिमाग में एक विचार आया और वह खुशी से मुस्कुरा दी । रघु को उसने देखा, वह पालक के अलावा हरी मिर्च भी बेच रहा था । वह अपनी जगह पर जाकर बैठ गई।  वह बार-बार रघु को देख रही थी।  रघु अपने ग्राहकों में व्यस्त था। रघु का ध्यान उसकी तरफ गया और उसने सक- पका कर अपनी मुंह घुमा लिया । आज वह उससे बातें करना चाहती थी लेकिन समझ नहीं आ रहा था ।क्या बोले ?वह सोच रही थी , पालक का दाम पूछे, नही -नही !  कभी सोचती मिर्च का दाम पुछे-  नहीं -नहीं  ! यह छोटी – छोटी     बातें तो हर रोज पुछा  करती है ।तभी  एक ग्राहक – सहिजन कैसे केजी है ? तीस रूपये ! फिर सोच में पड़ गई । बाजार खत्म हो रही थी। रघु का सब्जी पहले ही बिक गया था। वह जाने लगा । यह  देखकर उसने भी आवाज लगाई । रघु मैं भी चलती हूँ। रास्ते में रघु ने पूछा आज तुम उदास  क्यों  हो ? नही,  मैं उदास कहाँ हूँ । सच बताओ!  तुम्हारा सहिजन बिक गया ।वह कहना चाहती थी ,हाँ। लेकिन उसे डर था ,कहीं वह टोकरी ना  देख ले । वह बोली – नही ।  रघु अपने जेब से बीस रूपये निकाल कर देने लगा । लो अपने छोटे भाई के लिए मिठाई खरीद लेना ।नही -नही रहने दो । वह  तुम्हे जितना प्यारा है , मेरे लिए भी है ।  इस बार वह मना नहीं कर सकी। उसके नयन सजल हो गये लेकिन छुपाते हुए उसने  टोकरी से गिफ्ट निकाला और उसे दे दिया । हँस के बोली – जन्मदिन मुबारक हो ।  फिर दोनो हँसने लगे । बेटा आज जल्दी आ गए ।हाँ माँ, टोकरी रखते हुए उसने कहा। माँ पास आकर टोकरी से बोरे  को अलग किया । यह क्या है ?  माँ , सुनिधि ने दिया है । कल मेरा जन्मदिन था न । इसलिए आज उसने गिफ्ट दिया है।   सुनिधि कौन है ? माँ, पास के गाँव की लड़की है ।मेरे साथ ही  सब्जी बेचती है  , बहुत गरीब है , उसकी माँ नही है , वह एक ही सुर में बोला जा रहा था कि माँ ने  कहा, बस रहने दे । एक माँ , एक माँ  नहीं होने का दर्द समझ  सकती है बेटा ! खोल कर देख , क्या है । माँ  इसमें गुलाब का डंठल है । यह  कैसा गिफ्ट है , माँ ! पौधा होता तो लगा देता। इसे फेंक दूं माँ। नही ! , नही ! हाँ , यह बहुत शानदार गिफ्ट है बेटा!  माँ के कहने  पर  घर के आंगन में  उसने उसे लगा दिया।

 रघु और सुनिधि अच्छे दोस्त हो गए थे। सुनिधि कभी-कभी पर्व त्योहारों में उसके घर जाती थी।  रघु की माँ  उसके  लिए खास चीज बनाती । उसके मना करने पर भी उसे जबरदस्ती खिलाती । रघु कई दिन से उदास था क्योंकि सुनिधि बाजार नहीं आ रही थी । एक दिन वह उसके घर चला गया। सुनिधि   अपने घर के पास छोटे से   गुमटी में किराने की सामान बेच रही थी। रघु को देखकर उसने  कहा-  मैं कई दिन से तुम्हारे घर आना चाहती थी लेकिन समय नहीं मिल रहा था। रघु  अभी तक उसे साधारण कपड़ों में देखा था ।आज वह बहुत सुंदर लग रही थी ।उसे लगता था, बागो के बीच कोई परी बैठी है और चीजों को नहीं बल्कि अपने प्यार और स्नेह बांट रही है ।उसकी आवाज बहुत मीठी लग रही थी। उसके कानों में  बाली , खुशी से झूम रहे थे ।  उसके  हाथों की मेहंदी उसके मन को मजबूर कर रहे थे।

आज उसे वह युवती और समझदार लग रही थी। आंटी  कैसी हैं ।  आवाज सुनते ही उसका ध्यान टूटा । अच्छी हैं । तुम बाजार क्यों नहीं आ रही हो। पापा ने कहा  है कि मैं बड़ी हो गई हूँ ।  इसलिए मैं बाजार नहीं जा सकती । अब मेरी  छोटी बहन जाएगी । क्या नाम है उसका ? सृष्टि । दोनों चाय पीने लगे । जाते-जाते उसने ,उसके मां के लिए मिठाई दिया और वह बोली -आंटी से कह देना ,  मैं अच्छी हूँ । रघु का अब मन नहीं लगता । उसकी आँखे  उसे बाजार में उसे ढूंढती रहती । वह उसकी बहन से उसके बारे में पूछता  रहता । जिससे थोड़ा उसके दिल को चैन मिलता था।  सुनिधि  भी रघु  के बारे में अपने बहन से पूछती रहती थी । उसे लगता था । वह है जो उसके प्यार को समझ सकता है । जो मेरे भाई से प्यार कर सकता है । मुझसे  भी उतना ही प्यार करेगा । एक दिन   सृष्टी ने  कहा कि अगले सोमवार को दीदी का जन्मदिन है । दीदी ने बुलाया है । अब वह  पहले से बहुत ही खुश रहने लगा था।  रघु का उत्साह जैसे -जैसे समय करीब आ रहा था । वैसे -वैसे  बढ़ रहा था।  उसे खुशी से नाचने का जी कर रहा था।  वह दौड़कर उसके   घर चले जाना चाहता था । आज सुनिधि का जन्मदिन था।  उसे ऐसा लग रहा था।  जैसे हवा में उड़ रहा है और वह अब बादल को छू लेगा।  खुशी उसके चेहरे पर साफ दिखाई दे रही थी।  उसका ललाट चमक रहा था। जब वह उसके घर पहुंचा तो पहले से बहुत से लोग आए थे । सुनिधि ने उसके हाथ के गिफ्ट को  देखा।  वह समझ गई । प्यार कोई संसारिक चीज नही है । तभी तो उससे इतनी  खुशबू आती है । जो ह्दय मे  बंद है।  कुछ नहीं कहता।  कुछ नहीं बोलता । फिर भी महकता है । तो फिर गुलाब की खुशबू चार दीवारों में कैसे कैद रह  सकती है। वह  जान चुकी थी , जो गुलाब का डन्ठल उसने दिया था । अब वह गुलाब हो चुका है। उसका प्रेम  वर्षो तक सर्दी-गर्मी,बारिष और  आंधी -तुफान मे  , प्रकृति के सभी परिस्थियों  मे पलकर और जिंदगी के सभी मुश्किलो को सहकर उसके सामने है । वह सोचने  लगी क्या करे। उसके आंखों मे अश्रु आ आगे ।   लेकीन जल्दी से उसने  अश्रु छुपा लिया और  कमरे मे चली गई । फिर हिम्मत करके आई । सभी के सामने  केक काटी।  कमरे में बैठकर दोनों बातें करने लगे तभी रघु ने उसे गिफ्ट दिया । उसने पूछा- इसमें क्या है? वर्षो का  सरप्राइज है । समझो तुम्हारा ही गिफ्ट है । मैं कुछ नहीं समझी । तभी रघु की नजर  आलमारी में रखी गिफ्ट पर गई।  उसने पूछा – यह गुलदस्ता किसने दिया है । बहुत खूबसूरत गुलाब लगे हैं । उसने उठा लिया , बहुत खुशबू आ रही है।  वह कैसे कह दे । यह खुशबू बनावटी है । जो क्षण भर में खत्म हो जाएगी । असली खुशबू तो  तुम्हारे गुलाब में है।  अच्छा बताओ , किसने दिया है । मेरे मंगेतर ने ! क्या ? हाँ , मेरी सगाई हो गई है । यह सुनते ही रघु का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।  उसके चेहरे पर पसीना आने लगा । वह वहाँ से भाग जाना चाहता था । तभी उसने कहा , मैं समझ  सकती हूँ , तुम क्या कहना चाहते हो । मैं तुम्हारे प्यार को समझती हूँ। लेकिन तुमने  पहले कभी नहीं बताया । वह कुछ नहीं सुनना चाहता था। उसने पूछा , क्या तुम मुझसे प्यार करती हो । बाहर लोग मस्ती कर रहे थे। बहुत शोर हो रहा था। वह कुछ बोल ना सकी । रघु उठकर घर चला आया और कमरा बंद कर रोने लगा । सुबह उगते सूरज की रोशनी में उसने देखा गुलाब के फूल चारों तरफ सुगंध  फैला रहे थे । वह पौधों को पानी देने लगा।   अगले दिन सुनिधि ने  पैकेट खोला,  देखा एक बहुत बड़ा गुलाब था और उसने  एक ग्रीटिंग कार्ड पर अपने हृदय को  रख दिया था।
धर्मेन्द्र कुमार निराला निर्मल

 

प्रेरणादायक विचार 3

जे कृष्णमूर्ति विश्वविख्यात दार्शनिक तथा आध्यात्मिक विषयों के लेखक थे। वे माता-पिता की आठवीं संतान थे, इसलिए उनका नाम कृष्ण के नाम पर रखा गया ।जे कृष्णमूर्ति मानसिक क्रांति, ध्यान और समाज में सकारात्मक परिवर्तन और बुद्धि की प्रकृति जैसे विषयों की गहरी समझ रखते हैं। 1927 में एनी बेसेंट ने उन्हें विश्वगुरु घोषित किया। लेकिन दो वर्ष बाद ही वे थियोसाॅफिकल विचारधारा से दूर हो गए और फिर उन्होंने एक नए दृष्टिकोण का प्रतिपादन किया ।

जे कृष्णमूर्ति

जन्म : 12 मई, 1895   

अवसान: 17 फरवरी, 1986

* जीवन के किसी एक हिस्से को जानने के बजाय पूरे जीवन की समझ होना जरूरी है। इसके लिए आपको पढ़ना चाहिए, आकाश की ओर देखना चाहिए, नाचना-गाना चाहिए, कविताएं लिखना, महसूस करना और समझना चाहिए। बस यही सब जीवन है ।

  • आंतरिक अनुशासन आवश्यक है, बाह्य अनुशासन मन को मूर्ख बना देते हैं और नकल करने की प्रवृत्ति लाते हैं ।
  • एक विचार इतना धूर्त और चालाक होता है कि अपनी सुविधा के लिए वह सब कुछ बदल देता है ।
  • असल मायने में सीखना तब शुरू करते हैं, जब हम हमारी प्रतियोगिता की भावना त्याग देते हैं
  • हर व्यक्ति के भीतर एक दुनिया समाई होती है ।यदि  आप जानते हैं कि कैसे उसे देखना है और सीखना है तो उसका दरवाजा और चाबी आपके हाथ में है। आपके सिवा दुनिया में कोई भी आपको  उस द्वार और चाबी को नहीं सौंप सकता।
  • हमें आजादी सत्य से मिलती है, न कि आजाद होने की कोशिशों से।
  • स्वयं को न जानना ही अज्ञानता है ।ज्ञान हासिल करने की शुरुआत खुद को जानने से होती है ।
  • एकांत में रहना सुंदर अनुभूति है। हालांकि एकांत में रहने का अर्थ अकेले होना नहीं है ,बल्कि मस्तिष्क को समाज द्वारा प्रभावित और प्रदूषित होने से बचाए रखना है।

    —साभार: दैनिक भास्कर

मोटापे का दर्द(हास्य व्यंग)

मोटापे के प्रमुख कारणों में डिप्रेशन , जीवनशैली में बदलाव , अधिक भोजन और शारीरिक श्रम कम करना है। मोटापे के कारण ब्लड प्रेशर ,शुगर और पेट की बीमारियाँ अधिक होती है। और भी तरह-तरह की बीमारियाँ हैं ।लेकिन मोटापे का दर्द ऐसा है, जो सबसे अधिक होता है ।बाहर निकलो तो मन में सहानुभूति  होती है, कहीं कोई जीव ना दब  कर मर जाय।  रिक्शा  करते हैं तो रिक्शा वाले पर दया होती है-  कहीं बेचारे की हड्डी पसली टूट कर बिखर ना जाए ।लेकिन जब किराए की बात आती है ।तो मोटा आदमी टूटता है ।उसकी अंग-अंग  ढीले पड़ जाते हैं । और हाथी जैसा आदमी खुद से हल्का होने की कसमें खाता है। मोटे व्यक्ति को भी अपने बॉडी  के फायदे हैं । वह हवा में उड़ नहीं सकता । कम से कम तो कोई  निखतू   दोस्त तो नही कहेगा, आजकल बहुत  हवा में उड़ रहे हो ।अगर बीवी मोटी हो और गीतकार की बात माने तो बिस्तर पर लिटा तो गदे  की जरूरत नहीं पड़ेगी । मोटे आदमी को चैन कहीं  नहीं है ।उसे उठने- बैठने में दिक्कत ।कहीं जाता है, तो कोई कुर्सी ही नहीं मिलती है कि वह बैठे। अगर बैठे तो कुर्सी टूटने का डर।उसके नाप के कपड़े नहीं मिलता है । कभी-कभी टॉयलेट के दरवाजे पर खड़े मोटे व्यक्ति को धर्मराज उसके पापों के लिए यातना दे रहें है ।उसे ऐसा फीलिंग होती है। और वह क्षमा मुद्रा में हाथ जोड़े ,पैरों को मोड़कर दीवार से चिपक जाता है कि अब दिवार  ही इस  दारुण कष्ट के क्षण में उसका साथी है ।दिवार ही मनुष्य की विरह वेदना में अकेलापन में आंधी , बारिस- तूफान  और दुश्मनों के रक्षा में काम आता है ।जीवन के डूबती नैया को दिवार, अमिताभ को सहारा दिया था ।सबसे अधिक काम का चीन का दिवार  रहा है। जो हर मुश्किल में  अपने देशवासियों का रक्षा करता रहा है। लोग शादी के लिए खाते पीते घर का वर ढूंढते हैं ।मोटा व्यक्ति ही   ऐसे वर का प्रमाण है। इससे बेहतर कोई सबूत नहीं हो सकता ।क्योंकि मोटापा भी खाते -पीते घर की निशानी है। एक मोटा व्यक्ति होता  है ।जो चिंतित रहता  है ।उसे कहा जाता है ।क्यों टेंशन में हो ।चिंता मत करो यार -डोंट वरी लेकिन बंदा पलट कर बोलता है ।मैं चिंतित कहां हूँ । लेकिन मोटा व्यक्ति अपना दु:ख छुपा नहीं सकता ।इसलिए हर कोई मोटापा दूर करने का नुक्सा बताते रहता है। वह पास बैठे लोगों का भाषण सुनता रहता है ।जब कान पक जाता है। चुपके से उठ जाता है।सबसे ज्यादा लेक्चर तो घर में खाने पीने के परहेज पर होती है। कहीं कुछ मिठाई खाया कि हो हल्ला होने लगती है  । मिठाई  खाया नही कि घर पर बेचारे को डांट सुननी पड़ती है  कि ओ हवा मिठाई की तरफ फूल जाओगे लेकिन चिपक नही  सकते समझे और फिर वह बेचारा चुप । हर कोई मोटा भाई नहीं बन सकता। शहर के दिवार पर इश्तेहार लगा रहता है। मोटापा तीन महीने में छूमंतर। अखबार में विज्ञापन आता है। जिसमें एक महिला हाथ में फीता लेकर कमर नापती है ।वह स्लिम बॉडी- जीरो फिगर का कैप्सूल बेचती है । कई लोग टीवी पर तेल बेच रहे हैं। देश के युवा दण्ड – पेल से थक गए हैं ।वह कोई मोटापा दूर करने के लिए पंतजलि प्रोडक्ट चाहते हैं। कई बार उनका पेंट फट जाता है। उनका बार-बार बाबा से कनेक्शन कट जाता है ।बाबा बार-बार कहते हैं, करने से होता है। जबकि युवाओं का  कहना है ।इसी कारण देश का जीडीपी घट गया है  बाबा ! सबसे ज्यादा तो उसकी पत्नी आतंकित रहती है कि कहीं  गिर गए तो मेरी सांस  ही निकल जाएगी हे राम!

—- धर्मेन्द्र कुमार निराला निर्मल

प्रेरणादायक विचार 2

महर्षि वाल्मीकि आदि काव्य ‘रामायण’ के रचयिता हैं। पौराणिक कथानुसार, ऋषि बनने से पूर्व  वे दस्यु थे।

 एक साधु से भेंट के बाद उन्होंने पापकर्म छोड़ दिया और तपस्या में लीन हो गए ।एक बार उन्होंने  तमसा नदी के तट पर क्रीड़ारत  क्रौञ्च युगल को देखा ,इनमें से एक को व्याध ने बाण से मार दिया ।तब  वाल्मीकि के हृदय से  शोक की अभिव्यक्ति के रूप में एक श्लोक फूट पड़ा ।उसके बाद ब्रह्मा जी की प्रेरणा से उन्होंने आदिकाव्य ‘रामायण’ की रचना की।


 *  उत्साह ही बलवान होता है । उत्साह  से बढ़कर दूसरा कोई बल नहीं है । उत्साही  व्यक्ति के लिए  इस संसार में कोई वस्तु दुर्लभ नहीं है ।

*  राजा जो कार्य करता है, प्रजा उसी का अनुसरण करती है ।

  • जिन लोगों की आयु समाप्त हो जाती है, वे जीवन के अंतकाल में मित्रों द्वारा कही गई हितकर बातें भी नहीं मानते हैं।
  • शोक व दुख इस संसार में  शौर्य को नष्ट करने वाले होते हैं ।
  • बीते समय के साथ शोक स्वयं दूर हो जाता है ।
  • काल का विधान सबके लिए दुर्लंघ्य होता है ।
  • सदाचार ही  सज्जनों का आभूषण  होता है ।
  • पापकर्म का फल अवश्य मिलता है ।
  • शोक में डूबे व्यक्ति को सुख नहीं मिलता है ।
  • मधुरभाषी लोग तो बड़ी आसानी से मिल जाएंगे, किंतु जो सुनने में अप्रिय, लेकिन परिणाम में हितकर हो ऐसी बात कहने और सुनने वाले लोग दुर्लभ होते हैं।
  • मनस्वी लोगों का कहना है कि सलाह या परामर्श ही विजय का मूल है।
  • संचय  का अंत विनाश है , उत्थान  का अंत पतन,  संयोग का अंत वियोग और जीवन का अंत मृत्यु है।



    साभार : दैनिक भास्कर,   श्रीमद् वाल्मीकीय  रामायण( एक आर्ष महाकाव्य )

    टिप्पणीकार :  डॉ भीमराज शर्मा शास्त्री

क्यों कोसता है खुद को

क्यों कोसता है खुद को संतों की एक सभा चल रही थी,किसी ने एक दिन एक घड़े में गंगाजल भरकर वहां रखवा दिया ताकि संत जन जब प्यास लगे तो गंगाजल पी सके। संतों की उस सभा के बाहर एक व्यक्ति खड़ा था। उसने गंगाजल से भरे घड़े को देखा तो उसे तरह-तरह के विचार […]

क्यों कोसता है खुद को

गुड ब्वाॅय (हास्य व्यंग्य)

बच्चा पैदा होता है । तब ब्वाॅय  रहता है। लेकिन उसका संघर्ष गुड ब्वाॅय बनने में होता  है ।वह भौतिकवादी सुखों को छोड़कर आध्यात्मिक सुख में लगा रहता है। वह सीधा साधा पूरे जीवन बना रहता है । उसके दोस्त – साथी  गुड ब्वाॅय  के नाम का ठप्पा लगा देते हैं ।लेकिन आजकल  वह इस चोला को फेंकना चाहता है ।वह जमाने के साथ बदलना चाहता है। अब  उसे गुड ब्वाॅय    कहने पर चीढ़ होती है ।और इसी परेशानी में एक दिन वह घोषणा कर देता है कि गुड ब्वाॅय  उसे नहीं बनना। लाभ के पद से दूसरों को क्या हानि है। क्या पूरा जीवन वह क्रिकेट की खेलेगा । नहीं -नहीं वह पद का सुख लेना चाहता है ।उसके अंदर धैर्य है ।उसके प्रतिद्वंद्वियों को परेशानी है कि यह बंदा कुर्सी पर बैठेगा तो बैठे ही रह जाएगा। फिर हमारा क्या होगा ।तो इसे बीसीसीआई के अदालत में लाया जाए ।लाभ का पद छुड़ाया जाए और कुर्सी को टूटने से बचाया जाए ।और उधर बंदा गुडब्वाॅय बनने से इनकार कर रहा है। लाभ के पद पर बैठने को आमादा है ।उसके दोस्त- साथी   उसके पक्ष में खड़े हो गए हैं ।लाभ का पद सभी को परेशान कर रहा है ।जब मीडिया में शोर होने लगा  तब सोनिया गांधी को रातों-रात अपने लाभ के पद से इस्तीफा देना पड़ा था। अगर कोई बंदा अपने मल्टीटैलेंट से कई पदों पर आसीन होने के काबिल है ।तो उसका क्या दोष। यह तो उनकी दुर्गति है। जिनके पास सिर्फ एक ही टैलेंट है। ना खाएंगे ना खाने देंगे । अब ये भी भला कोई    टेलेंट है ।आप सीधे बोल नहीं सकते।  की पच  नही सकता है ।इसलिए खा नहीं रहे हैं ।खाना आसान है  लेकिन अंदर -अंदर जो पचाने  का तिड़कम  होता है ।वही बड़ी बात है । डर है कहीं कोई बाहर ना उगल दे। लेकिन कोई पचाने लिए तैयार है तब किसी दूसरे का तेल क्यों जल रहा है ।उसे गुड ब्वाॅय  नहीं बनना है ।उसे यह शब्द उसके दोस्त साथियों ने चालाकी से उसके गले में बांध दिए और हर मालपुए से अलग कर दिया। जब खाने की इच्छा हुई दूसरा चिल्लाया तू अच्छा लड़का है ।तुझे यह सब नहीं करना चाहिए। तू बिगड़ जाएगा, तू मत देख ,  तू मत कर और वह बेचारा उनकी राजनीतिक चाल को समझ  नही पाया। जान लुटाने वाले लूटाते रहें और वह समझ नहीं पाया ।उसे तो बाद में पता चला कि उनका एक ही सिद्धांत है ।ना खाएंगे ना खाने देंगे ।उसे कहां मालूम था  कि खाने के काबिल नहीं है ।तो खाने को देगा कौन ? जो भी हो वह गुडब्वाॅय नहीं बनना  चाहता । वह तोड़ देना चाहता है  , इस मिथक को । वह बहते  गंगा में हाथ होना चाहता है।  लाभ का पद चाहता है। बराबरी चाहता है।

—- धर्मेन्द्र कुमार निराला निर्मल

धीरे -धीरे कस्टमर बढ़ाना है (हास्य व्यंग्य)

90 के दशक में एक गाना बहुत चला ।यह प्रेमियों के जुबान पर था। धीरे धीरे प्यार को बढ़ाना है ।हद से गुजर जाना है ।यह सिलसिला प्रेम गली से कॉर्पोरेट गली तक आ गई है। धीरे धीरे कस्टमर बढ़ाना है ।हद से गुजर जाना है ।आजकल कम्पनीयाँ  शुरू में ग्राहकों को लॉलीपॉप खिला रहीं हैं,   फ्री में और हम खा रहे हैं । मुफ्त का माल उड़ाने का  हर कोई मजा लेना चाहता है। जब फ्री में मिल रहा है  ।तो सभी एकजुट होकर मजा लेते हैं । लेकिन  यह प्यार हद से गुजरता है। तो सभी कड़ाहने लगते हैं । कम्पनी का नीति सच्चाई का नीति  है । वह पहले उद्घोषणा कर चुकी  होती है ।कस्टमर यानी कष्ट से मर। धीरे-धीरे मर। पहले योजना सरकार लेकर आई- पहले आओ पहले पाओ।


इसे  अंग्रेजी में फर्स्ट कम फर्स्ट सर्व कहते हैं। और मैथ में फीफो। फिर भूखे करोड़पति इकट्ठे हो गए ।बाद में पता चला कई नेता बड़े काॅरपोरेट घराने से बोल चुके थे – पहले पवाओ फिर पाओ लेकिन प्रचार हुआ पहले आओ -पहले पाओ । बाद में कैग के  रिपोर्ट में  कई करोड़ घाटे का पता  चला । कई  सिम प्रदाता कंपनी बंद हो गई । अभी 2जी घोटाले में कई नेता फंसे हैं ।सीबीआई दरवाजे पर जा -जाकर वापस लौट रही थी। एक दिन वह मुड में आ गई ।सुपरमैन की तरह चारदीवारी फांदकर  एक नेता जी को पकड़ लिया। ई-कॉमर्स के कई कंपनीयाँ  ऑनलाइन खरीदारी  पर ऑफर दे रही हैं। मजा है  ।डबल मजा है । बरसों से हमारे बुजुर्ग आशीर्वाद देते रहे हैं। जियो जियो ।अब उनका आशीर्वाद फलीभुत हुआ है । शुरू में  फ्री मे  बात हुई ।लोगों की आदत हो गई ।आटा से सस्ता डाटा हो गया। कम समय में रिश्ता और समय दोनों बच रहा है ।और बात अनलिमिटेड हो रही है ।पूरा बायोडाटा लिया जा रहा है प्रेमियों में । अब जब कंपनी को लगा की कॉलिंग प्राइस बढ़ाना चाहिए । सभी ने मिलकर   काँलिग प्राइस बढ़ा दिया । अब गरीब आदमी के लिए डाटा महँगा  हो गया फिर भी पेट भरा हो  या ना हो बात करना जरूरी है ।अब रिश्ता बचाने का प्रश्न हो गया है । 1 दिन कॉल नहीं जाने पर उधर से रिटर्न गिफ्ट में घमंडी , लापरवाह और इसके साथ दो चार गाली सौगात में मिल रहा है । 4G आ चुका है ।पहले एंटी क्लॉक- क्लॉक वाइज समझ में नहीं आता था ।अब समझ में आने लगा है। चक्र घूमता रहता है । इसे देखते-देखते आंखें पथरा जाती है। फिर भी बंदा एकांत साधना में लीन आजू बाजू भूल ;  लिंक  केंद्रित रहता है ।पहले व्यक्ति किसी काम से सरकारी ऑफिस जाता तो पूछा जाता आपका  लिंक है ।नहीं  हो तो बंदा काम को टाल देता था ।आज अगर आपका लिंक है ।तो उसका लिंक फेल है। पहले हर काम के लिए लिंक लगाया जाता। आज जुगाड़  पर लिंक भारी  पड़ रहा है ।कभी – कभी कोई धमकी में कहता है ।हमारा लिंक दिल्ली तक है ।मतलब  पहुंच संसद तक है ।तब सामने वाला बोलता है ; तो क्या उखाड़ लोगे। अब वह क्या बोले। वह सब कुछ कर देगा लेकिन उखाड़े गा नहीं । उसे मालूम है ।जड़ से उखाड़ देगा तो फिर लड़ेगा किससे ।कॉलिंग रेट बढ़ रहा है ।फिर भी  कंपनी  घाटे मे जा रही है ।अभी भी वही गीत गुनगुना रहे हैं । धीरे-धीरे कस्टमर बढ़ाना है। हद से गुजर जाना है।   वे किस चीज में हद से  गुजर जाएंगे रहस्यमय है।

——– धर्मेन्द्र कुमार निराला निर्मल

भाव का भाव (हास्य व्यंग्य)

भाव एक शब्द जिसमें दो अक्षर हैं ।  भा और व ।लेकिन हैं बड़े काबिल ।अक्सर लोग दूसरे पर व्यंग छोड़ते रहते हैं ।बड़ा भाव खा रहा है । अरे मेरा कहना मान ले तब सामने वाला मंद- मंद मुस्कुरा देता है ।वह कहे तो क्या कहे, क्या पता  सामने वाला मेरे भाव का गलत भाव ना निकाल ले । सबसे ज्यादा इसका उपयोग होता है -दिलजलों में ।बड़ी भाव खा रही हो ,कभी मेरी भी सुन लो । फिर सजनी  मंद -मंद मुस्कुरा कर तिरछी नजर से देख कर हंस देती है। और  रफूचक्कर हो जाती है ।फिर दीवाने दिल में गुदगुदी होती है। चेहरे पर हल्की मुस्कान आती है ।आजकल प्याज का भाव इतना बढ़ गया है कि बिना काटे की आंखों से आंसू आ रहा है।
भाव  का अपना प्रभाव है ।जहां है वहीं अपने भाव में ध्यान मग्न है। उसका जीवन संत महात्माओं की तरह मालूम होता है। उसका चित्त निर्मल है । वह दृढ़ रहता है ।विचलित नहीं होता है ।चाहे कोई गाल फुलाए  या पेट ।ऑफिस के बाहर सभी एक ही प्रकार के जीव होते हैं ।अंदर सीनियर -जूनियर हो जाते हैं ।सीनियर भाव खाने लगता है ।जूनियर पर रौब झाड़ने लगता है। सरकारी बाबू चपरासी पर प्रभाव दिखाता है। पान सुपारी फ्री में खाता रहता है ।अगर कभी बेचारा गलती  से ज्यादा  चुना लगा देता है । तो भी डांट सुनता है ।बहुत चापलूसी करते हो तुम ।और तो और ,उसके   सहकर्मी व्यंग करते हैं ।बहुत तेल   लगाते हो लेकिन ना लगाओ तो अफसर     बिफड़ता    है ।भाव सबको चाहिए ।अभाव किसी को नहीं। लेकिन भाव कोई देना नहीं चाहता ।पिछले दिनों एक बीयर बार का श्रीगणेश के लिए नेताजी के पास आमंत्रण आया। लेकिन वे देर से पहुंचे । चापलूस मीडिया ने जब कैमरा घुमाया तो बोले- गांव में तीर्थ यात्रा पर गए थे ।जनता हमारे लिए देवता से कम नहीं है।और जनता कह रही है नेता जी के दर्शन दुर्लभ हो गए हैं, चुनाव के बाद से । यही उच्च कोटि का भक्ति है ।जहां इंसान दूसरों को देवता मान लेता है और एक- दूसरे के दर्शन को लालायित रहता है ।जब नेता जी के ऑफिस जाओ तो पता चलता है कि   नेता जी दिल्ली चले गए हैं ।और जब नेता जी गांव आते हैं तो किसान खेतों में चले गए हैं। यह सिलसिला दिन से महीना , महीना से वर्षो तक चलता है । फिर यही बिछड़ने का दर्द चुनाव में खुशी बनती है। जनता फूल- मालाओं से स्वागत करती है । भूतपूर्व  नेता ने उनके आने से पूर्व ही फिता  काट दिया ।तो अपने सम्मान के लिए लड़ने लगे। उनके चेला चपाटी कई कुर्सी तोड़ दिए। और बोतल उठा ले गए ,अपने देवता को चढ़ाने के लिए। सालियाँ ज्यादा भाव खाती हैं। सबसे अधिक उनको भाव का अभाव रहता है। जितना दो  उतना कम रहता है ।उनको कभी लूज मोशन नहीं होता है ।वह कितना भी भाव खा ले संतुष्ट नहीं रहती हैं ।देश जैसे -जैसे  तरक्की कर रहा है। लोगों का भाव बढ़ रहा है। वह दिन दूर नहीं जब भाव बाजार में बिकने लगे ।कभी-कभी एक बंदा के पीछे कई बंदे लगे रहते हैं ,उपकार करना चाहते हैं कि उसका दोस्त जो 2 बार फेल हुआ है।और हर बार उसका  परसेंटेज मल्टीपल में कम हुआ है ।रुक जाए लेकिन दोस्त है कि भाव खा रहा है अकेले मजा ले रहा है। घर में पत्नी भाव खाती है और  हर काम के लिए निहोरा कराई जाती है ।बच्चे का डाइपर पापा बदल रहे हैं ।पति महोदय सफाई अभियान में कभी-कभी संगिनी का साथ देते हैं। जमाना बदल गया है। बिना ताव के दाल भी नहीं गल  रही है ।वह भी भाव खा रही है।

—धर्मेन्द्र कुमार निराला निर्मल