रोना भी एक कला है(हास्य व्यंग)

कला कोई भी हो वह आपकी आत्मा का अनुभुती कराती  है और कला निस्वार्थ और निष्काम भावना से जुरी हो तो आत्म संतुष्टि देती है।इधर रोने को भी कल मान लिया गया है वैसे टपरे के नीचे रहने वाले भी रोते हैं लेकिन उनके आंसू ऊपर से टपक रहे पानी में घुल जाती है वे बेचारे सरकारी बाबुओं को उलाहना देते रहते हैं कि हमारी कोई नहीं सुनता।आंधी हो या पानी ; वह टपरे के नीचे अलाव जलाता है और लिट्टी चोखा बनाता है ।उसकी आंखो का पानी नहीं सुखता है कि कोई कुपोषण से तो कोई  कर्ज से मर जाता है।उसका ह्रदय चित्तकार कर रोता है।लेकिन वह जल्दी भूल जाता है।  वह जानता है यही उसकी नियति है ।ऐसा करूण रोदन का  नकल  कोई नहीं कर सकता है । ईधर कई दिन से नेता जी विधायक की सीट के लिए जुगाड़ लगा रहे हैं लेकिन कोई सुन नहीं रहा है।
तब एक लंगोटिया यार ने भले ही उसका लंगोट से कोई वास्ता नहीं हो, सुझाव दिया कि पड़ोस में रहने वाले साइकोलॉजीस्ट से काहे नहीं संपर्क कर लेते ।साइकोलॉजिस्ट में नए-नए रोने के तरीका बताया। सभी के लिए अलग-अलग चार्ज था ।लेकिन नेताजी को रोना नही आया ।बिना रोए टिकट कैसे मिले। नेताजी क्षेत्र के  बाहुबली थे । गोया उनके पूर्वज कभी रोए नहीं।  अब उनको रोना पड़ेगा। लेकिन अंत में यह तय हुआ कि डॉ मुकुंदी लाल नेताजी के तरफ से पैरवी करेंगे उन्हें नेताजी का पीए बना दिया जाए।पर   डॉक्टर मुकुंदी लाल पहले ही रोने लगे। बात कि वे भी कई दफा कई पार्टियों के चक्कर लगा आए थे फिर उनमे रोते- रोते अद्भुत प्रतिभा आ गई थी। और उनका पूरा विश्वास था कि जो नेताजी के मूड को भांप जाए उसे मनोविज्ञान का डिग्री दे देना चाहिए ।उनसे गिरगिट भी प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता ।अब नेताजी रोने का कला कैसे सीखें। फिर सहपाठियों ने सुझाव दिया कि नेताजी स्टेशन चले जाए और भिखारीयों से आसानी से रोना सीख जाएंगे।उनकी अजीब आवाज होती है -अल्लाह के नाम पर दे- दे, अल्लाह के नाम पर दे दे ।लेकिन इस आवाज में सेकुलरिज्म नहीं है ।सो नेता जी उनका नकल नहीं उतारेंगे। फिर सोचा गया राम के नाम पर वोट मांगने में क्या बुराई है। लेकिन एक समस्या है नेताजी के चेहरे पर वह फीलिंग नहीं आ रही है। शब्द भी दिल में घाव नहीं कर रहे हैं जैसे भिखारींयो के  शब्द करते हैं। फिर तय हुआ नेताजी को मुंबई भेजा जाए। विभिन्न प्रकार के रोल में पारंगत किया जाए ।रावण की तरह अट्टास कर हंसने की प्रैक्टिस होना चाहिए। जीतने के बाद हंसने पर जब मोहल्ले वाले नहीं जाने तो मतलब जीत की खुशी नहीं है। वैसे मुंबई में बहुत बड़ी नौटंकी हुई। रातों रात सरकार बन गई। शपथ दिलवा दिया गया और उपमुख्यमंत्री महोदय अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को सफाचट कर फिर पूर्व पार्टी में आ गए । जैसे भारतीय सेना रातों-रात पाकिस्तान के आतंकी शिविर का सफाया कर अपने घर आ गई। देश में दोनों बार बहुत हलचल हुआ ।कई रिकॉर्ड बने। इन सभी घटनाओं से नेता जी जरूर सीखेंगे। घपेलू चेलो को यह आशा है और वे भी चाहते हैं कि हमारे नेता जी बाहुबली होने के अलावा सरकारी पैसों की गमन में भी पारंगत हो जाए ताकि उनके छोड़ने के बाद बचे-खुचे को खाकर  वे फलते फुलते रहें। चीतचोर लव गुरु बताते हैं। रोने के बाद दिल हल्का हो जाता है ।इसलिए फूट फूट कर रोना चाहिए ।ऐसे मामले  मे रोने का कोई साइड इफेक्ट नहीं है। बल्कि  इंटरवल के बाद मूड रोमांटिक हो जाता है ।मन में यादों का लड्डू फूटने लगता है। रोना हर जगह जरूरी है। आजकल जब तक आप  सरकारी बाबू के ऑफिस में दो-चार बार रोएंगे नहीं फाइल सरकेगा  नहीं । वह भी दो चार बार चेहरा देखकर परखेगा  कि कहीं आप घरियाली आंसू  तो नहीं बहा रहें हैं ।अगर ऐसा हुआ तो वह अपने सहकर्मियों के बीच हंसी का पात्र बन जाएगा , खुद बेवकूफ बनने के लिए। हरिशंकर परसाई जी बताए गए कि एक बार उड़ती दरख्वास्त को  बचाने के लिए नारद जी को  घुस के एवज मे उनको अपनी वीणा रखनी पड़ी थी लेकिन यह बीती बात हुई। वजन रखने के अलावा रोना भी जरूरी है। कारण कई लोग अपने अपने कामों के लिए वजन रख दिया है फिर मुंशी काम पहले किसका करे ।वह कॉनफियुज्ड हो जाता है ।सभी पर बराबर वजन है इसलिए सभी का चेहरा एक जैसा लगता है। लेकिन जो रोता है; उसी का चेहरा याद आता है तभी उसका काम पहले होता है । आजकल सबसे ज्यादा रोना पति प्रेमियों की हो रही है । नाईट शिफ्ट के  लिए नहीं  बल्कि मोबाइल लुगाई नहीं दे रही इसलिए। और उधर मुंह बोले दोस्त  व्हाट्सएप पर  लगातार  चिला रहे हैं ; कहां गया बे , कहीं मर गया। आ रहे  धुआंधार नोटिफिकेशन के आवाज ,उसके शुभचिंतक दोस्तों की उपस्थिति बता रही है लेकिन बीवी का कहना है पूरे दिन मोबाइल देखते रहते हैं हमें देखते ही नहीं। मैं तरस गई हूँ कि हमारे सोलह सिंगार को हमारे प्राण प्रिय  निहारें। लेकिन इन्हें तो मोबाइल सौतन से फुर्सत ही नहीं। वह जमाना लद गया जब दुल्हनियां सोलह सिंगार कर शाम को घर बैठे रहते थी तब पतिदेव शाम को काम से घर लौटने पर उनके चंद्रमुखी सा चेहरा देख खिल जाते थे और उनका सारा थकान इंद्रजीत के   नाग पास कि तरह हर लेती थीं। लेकिन आजकल पति महोदय गर्दन नीचे  झुकाए  मोबाइल पर नजर टिकाए गृह प्रवेश करते हैं और गर्दन उठाए  परदेसी गमन।

धर्मेन्द्र कुमार निराला निर्मल

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