ना घर का ना घाट का(हास्य व्यंग)

धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का,यह  लोकोक्ती बहुत प्रसिद्ध है ।धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का , लेकिन इसमें कुत्ता  जैसा वफादार जीव को क्यों घसीटा जाता है। वह निर्दोष जीव है । एक बार एक कुत्ता धोबी के घर भूखा था|
भोजन के लिए कोहराम मचा रखा था  फिर जब समय अधिक हो गया तो पटा तुराकर, धोबी के घाट की ओर दौड़ पड़ा लेकिन तब तक धोबी कपड़ा धो कर वहां से वापस चल दिया था| जब कुत्ता वहां पहुंचा तो धोबी  वहां नहीं था । फिर कुत्ता बेचारा पछताने लगा।  अब उसे कौन समझाए नाहक रस्सी  तुड़ा दी तभी एक दूसरा कुत्ता आया और वह जोर- जोर से भौंकने लगा । एक नेता वहां से गुजर रहे थे| उन्होंने कुत्ते की भाषा समझ ली और उनके अलावा कोई नहीं समझ सकता था । वह कहने लगे धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का| कुत्ता सुना तो उसे वे अपना हितेषी लगे और  फिर क्या; कुत्ता, नेता जी के चार चक्कर लगाया और हाथ जोड़कर खड़ा हो गया फिर उनके पैर चाटने लगा| मानो इसका ,इनके साथ कई जन्मों से नाता है । वह कुत्ता बेचारा अपने किए पर पछता रहा था फिर भी वह नेताजी के साथ गुलेटिया मारने लगा| नेता जी समझ गए , यह वफादार देशी कुत्ता है । रोटी देंगे तो भौंकेगा नहीं। बल्की हमारा टलवा चाटेगा और हमारी सेवा भी करेगा ।उन्हें कुत्ते से परम ज्ञान प्रात हुआ। फिर  कई कुत्तों को रोटी फेंका और वे सभी उनके वफादार हो गए । उन्होंने कुत्ते का गुण राजनीति में भी प्रयोग किया और इसका शत-प्रतिशत परिणाम पाया फिर क्या था, देखते – देखते  बड़े नेता बन गए फिर मंत्री।  उन्होंने अभी तक कुत्ते को ही अपना राजनीतिक गुरु मान रखा है| कहते हैं कुत्ता वफादार जीव है ।मेरे अंदर कुत्ते के सभी गुण बृजमान है। जहां बैठते हैं,  सफाई कर बैठते हैं| मतलब अपने दुश्मनों और विरोधियों का सफाया कर देते हैं फिर भी चौकाना रहते हैं। अगर कोई रोटी देने के लिए बुलाता है दौड़ पड़ते हैं। सोते हुए भी पेट का ख्याल रखते हैं| जब कोई अजनबी आता है तो लड़ते हैं फिर जान पहचान कर लेते हैं। अपने से बड़े नेता के आगे चापलूसी करने में पीछे नहीं रहते हैं|

इसी से उनका जीवन प्रशस्त है| उनके इलाके में कोई घुस आए तो चिल्लाने लगते हैं| कुत्ते  कम ही सोते  हैं वैसे नेता जी भी कम ही सोते हैं।

वह हमेशा अपने गुणों की तुलना कुत्ते से करते हैं| वही उनका गुरु है। कुत्ता भी धन्य  है ऐसा चेला पाकर| कई कुत्तों का पूर्व जन्म का फल है जो आज सुंदरीयों के गोद में खेलते हैं युवा बेचारे तरस जाते हैं उनकी गोद में बैठने को| और वे कुकुरें प्यार से बिस्किट खाते हैं| वे तो लाखों में बिकते हैं|  कभी- कभी चार- पाँच साल पर इनका सिजन आता है।  ये एयर कन्डीशन-वाईफाई और हाईफाई रिजाॅर्ट मे कभी -कभी लाॅक हो जाते हैं। एक दूध देने वाली गाय की जितनी सेवा नहीं होती उतना इन कुत्तों की होती है| फिर भी किसी को कुत्ता कह दो वह भरक जाएगा| कुत्ते सुबह-शाम पार्क में टहलते हैं| ब्रांडेड साबुन से नहाते हैं| और तौलिए से शरीर को पुछवाते हैं| और आम आदमी अपने फटे चिथड़े को भी सिला नहीं पाता| अब कुत्ते , कुत्ते नहीं रह गए हैं मनसे रईस हो  गए हैं| पहले के कुत्ते ज्यादा लालची थे| कभी-कभी कुत्तों को भी डरना पड़ता है| असली नायक किसी को नहीं छोड़ता,  मौका मिलते ही काट भी लेता है और चिल्लाता है , कुत्ते -कमीने मैं तेरा खून पी जाऊंगा| कभी-कभी इन कुत्तों को नाच देखने का भी मौका मिलता है| तब  संस्कृति -परंपरावादी व्यक्ति चिलाता है ।बसंती इन कुत्तों के सामने मत नाचना| कुत्ते मंद मुस्कुराते हैं- सोचतें हैं यह इम्पाॅसिबल है ।हम टेरीबल है।आजकल के कुत्ते  रोटी – चावल कम खाते हैं ।रईस हो गए हैं| अब पुकारने पर भी नहीं आते| उन्हें मालूम है रोटी आप खिलाएंगे ।अगर चिकन होता तो आप बुलाते नहीं| अब कुत्ते, कुत्ते नहीं रह गए हैं| कुछ फिल्मों में काम करने लगे हैं ,कुछ राजनीति में !

—– धर्मेन्द्र कुमार निराला निर्मल

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