वर्चुअल मंच(हास्य व्यंग)

नेता हैरान हैं, कोरोना ऐसा महामारी आया कि उन्हें मारा- मारी , लात- घुसा मारने को नहीं मिल रहा है ।जनता जो नेता जी पर चप्पल उछालती थी। उसे भी ऐसा सौभाग्य प्राप्त नहीं हो रहा है । वह अपना एंड्राॅयड मोबाइल पर प्रहार नहीं कर सकता है । वह लाचार है। वर्चुअल डिबेट मे मजा नहीं आ रहा है। एंकर हैरान हैं।

वे डिबेट में गरमा गरम बहस नहीं कर पा रहे हैं । अगर इस वर्चुअल डिबेट में एंकर इधर चिल्लाया , बंदा कान से लीड निकालकर उधर क्या पता पानी पुड़ी खाने चला जाए। अगर उसके ऑफिस में हो तो हाथ जोड़ कर , पैर पकड़ कर विनती किया जा सकता है । वर्चुअल कवि सम्मेलन हो रहा है। दर्शक वाह – वाह यहां बोल नहीं रहे हैं, टाइप कर रहें हैं। हंस नही रहे हैं बल्कि अपनी भावनाओं को शब्दो में व्यक्त कर रहे हैं – हा -हा। पिछले दिनों देश के एक बड़े नेता जी का वर्चुअल रैली हुआ । उन्होंने बताया यह चुनाव का आगाज है । और उधर विरोधी दल के नेता थालीपीट कर विरोध जताते रहे । यह वर्चुअल रैली का पहला विरोध का अजीब तरीका था। लोग कहतें है- लोहा , लोहा को काटता है। होना भी यही चाहिए था कि वर्चुअल रैली का विरोध वर्चुअल तरीके से होता।सारी दुनिया देखती ,उन्हें भी नया आडिया मिलता । कवि काल्पनिक लोक मे जीता है ।वह अकसर चाँद-तोड़ने कि बात करता है।अब वह चाँद पर वर्चुअल प्रेम का झण्डा गाड़ सकता है और वर्चुअल तारे तोड़कर वर्चुअल तरीके से प्रेयसी को दे सकता है। जमाना बदला है लेकिन दिल के जज्बातों के शब्द नहीं बदले। सुनने देखने का माध्यम बदला है । कहा जाता है, शब्द ब्रम्हा है। वह कभी नष्ट नहीं होता है। चाहे नेताजी वर्चुअल रैली में दूसरे नेता को गाली दे या यथार्थ मे ।असर उतना ही होता है ।कहीं ज्यादा होगा, उसे आसानी से फैलाया जा सकता है। वर्चुअल रैली में इंटरनेट की समस्या आ रही है ।

वक्ता बोल रहें हैं और उधर इंटरनेट गायब। तब नेताजी का मूड ऑफ हो जाता है। जो गर्मी आ गया था शरीर मे अचानक गायब हो जाता है इधर दर्शक दिल थाम के बैठे हैं। उनकी नजर मोबाइल ,लैपटॉप स्क्रीन पर है। राह देखते -देखते उनकी आंखें दर्द करने लगती है । जब नेताजी मुखातिब होते हैं ,पता चलता है दर्शक का मोबाइल बैठ गया है, अगर बैटरी है तो इंटरनेट की स्पीड नहीं है। नेता जी की बात ऐसा लगता है कि बीच बीच में अटक रहा है। रील खराब है या रियल लाइफ पता ही नहीं चलता।

वर्चुअल रैली से मुद्रा की बचत हो रही है ।नेता जी अपने घर में बैठकर विकास का गीत गा रहें हैं और दर्शक भी बंद कमरे में नाच कर खुश हो रहे हैं। पहले ऐसा वे नहीं कर पा रहे थे। प्रोपेगेंडा अब पेंडिंग नहीं रहता बल्कि वर्चुअल मिटिंग उनके काम के तरीके को बदला है । अब वर्चुअल दुश्मन से डर नहीं लगता। अब वे पहले से खुंखार होकर अपने दुश्मन को ललकारते हैं। पहले घटनास्थल पर कुटाई का डर रहता था । अब नही है। मंच पर आकर कोई विरोध करने वाला भी नहीं है । लेकिन एक चीज की कमी खल रही है ।नेताजी का लल्लो चप्पो करने वाले यहां नहीं है। जिसे सुनकर उन्हें परम आनंद मिलता है। अपना मुंह मियां मिट्ठू तो हर कोई बनता है लेकिन दूसरा कोई गुणों की बखान करे तो बांछे खिल जाती है और हर इंसान यही तो चाहता है।

– धर्मेन्द्र कुमार निराला निर्मल

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