प्रेरणादायक विचार 2

महर्षि वाल्मीकि आदि काव्य ‘रामायण’ के रचयिता हैं। पौराणिक कथानुसार, ऋषि बनने से पूर्व  वे दस्यु थे।

 एक साधु से भेंट के बाद उन्होंने पापकर्म छोड़ दिया और तपस्या में लीन हो गए ।एक बार उन्होंने  तमसा नदी के तट पर क्रीड़ारत  क्रौञ्च युगल को देखा ,इनमें से एक को व्याध ने बाण से मार दिया ।तब  वाल्मीकि के हृदय से  शोक की अभिव्यक्ति के रूप में एक श्लोक फूट पड़ा ।उसके बाद ब्रह्मा जी की प्रेरणा से उन्होंने आदिकाव्य ‘रामायण’ की रचना की।


 *  उत्साह ही बलवान होता है । उत्साह  से बढ़कर दूसरा कोई बल नहीं है । उत्साही  व्यक्ति के लिए  इस संसार में कोई वस्तु दुर्लभ नहीं है ।

*  राजा जो कार्य करता है, प्रजा उसी का अनुसरण करती है ।

  • जिन लोगों की आयु समाप्त हो जाती है, वे जीवन के अंतकाल में मित्रों द्वारा कही गई हितकर बातें भी नहीं मानते हैं।
  • शोक व दुख इस संसार में  शौर्य को नष्ट करने वाले होते हैं ।
  • बीते समय के साथ शोक स्वयं दूर हो जाता है ।
  • काल का विधान सबके लिए दुर्लंघ्य होता है ।
  • सदाचार ही  सज्जनों का आभूषण  होता है ।
  • पापकर्म का फल अवश्य मिलता है ।
  • शोक में डूबे व्यक्ति को सुख नहीं मिलता है ।
  • मधुरभाषी लोग तो बड़ी आसानी से मिल जाएंगे, किंतु जो सुनने में अप्रिय, लेकिन परिणाम में हितकर हो ऐसी बात कहने और सुनने वाले लोग दुर्लभ होते हैं।
  • मनस्वी लोगों का कहना है कि सलाह या परामर्श ही विजय का मूल है।
  • संचय  का अंत विनाश है , उत्थान  का अंत पतन,  संयोग का अंत वियोग और जीवन का अंत मृत्यु है।



    साभार : दैनिक भास्कर,   श्रीमद् वाल्मीकीय  रामायण( एक आर्ष महाकाव्य )

    टिप्पणीकार :  डॉ भीमराज शर्मा शास्त्री

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