चाऊमिन राजा(हास्य व्यंग्य)

महंगाई बढ़ रही है। रोजगार घट रहें  हैं। युवा बेरोजगार हो रहें हैं । सरकार के मंत्री तरह – तरह के बयान दे रहे हैं। कोई पकौड़े बेचने को कह रहा है ।तो कोई आलू  से सोना बनाने को , तो कोई नाले के गैस से खाना बनाने को कह रहा है। देश में जब से विदेशी निवेश बढ़ा है ।तब से गोल मटोल पिज़्ज़ा बर्गर के बिक्री भी बढ़ा  है ।फास्ट फूडो की बाढ़ आ गई है। शाम को सज धज के बाजार जाओ तब ठेले पर जहाँ-तहाँ बर्गर ,गर्म तेल में स्विमिंग कर रहा है। वह खुश है। शहर से निकलकर गांव आ चुका है और देसी चटनियों से उसका संयोग हो गया है ।वह मजे में है उसका चिर परिचित दोस्त चाऊमीन साथ निभा रहा है। वह मुंह से लटकर छटपटा नहीं रहा है ।बल्कि झूला झूल रहा है ।उसे परम आनंद की अनुभूति हो रही है ।कहते हैं  जब व्यक्ति को आनंद की अनुभूति होती है तो नाचने का मन करता है। जी चाहता है नाचते-नाचते कमर तोड़   लें लेकिन आज के बाबा टॉर्च जलाकर नाचते हैं उनके ऊपर फ्लेक्स मारा जाता है तो बाबा रंगीन नजर आते हैं। भक्तों को खूब भातें हैं ।मौका मिलने पर  फिल्म भी  बनाते हैं । भजन भी गाते हैं ।युवा अचंभित हो जाता है । सोचने लगते हैं ,बाबा को मुक्ति मिल गई है ।वह कैसे पीछे रह गए । कुछ दार्शनिक कहते हैं ।प्रेम अंधा होता है। कभी भी कहीं भी हो सकता है ।भजन सीखते -सीखते परम शिष्या, बाबा के उम्र के गवैया से ही प्यार कर बैठती है। इस पर कुछ लोगों का कहना है । वर्षो तक   भगवान के भजन का प्रतिफल है जो अब   फलीभूत हुआ है। ऐसा भी हो सकता है ,इंद्र का कोई चाल हो और हमारे बाबाओं के घोर तप और किए जा रहे  परोपकार से डरकर आधुनिक उर्वरसी भेज दिया हो और आदेश दिया हो जाओ परम लावणीयों, चितचोर बाबाओं का साधना अस्तखलित  कर दो। कहीं ऐसा ना हो हमारा सिंहासन खतरे में  पड़ जाए । जो भी हो चाऊमीन बड़े शहरों से निकलकर खुले आसमान के नीचे तवे पर विराजमान है ।वह खुले आकाश को देख रहा है ।वह अपने आप में मगन है ।उसके दोस्त साथी धूल ,मिट्टी, हवा के झोंकों के साथ उसका साथ निभा रहे हैं। वह मक्खी जो कभी उसके  आस पास सिर्फ मडराती   थी ।वह गेहूं के बालों पर नहीं बैठ सकती थी ।आज उसके स्वाद का सुगंध ले रही है। यहां सभी मिल गए हैं । बड़े तवे   पर विराजमान आलू चप , पियाजी ,एग रोल ,मोमोस के बीच  चाऊमीन अपने को राजा मान बैठा है । यह देसी आइटमो के तबीयत पर हंस रहा है। यहाँ   सभी थाल में पड़े धूल फांक रहे हैं । इनको कभी -कभी गुस्सा आता है ।लेकिन कर भी क्या सकते हैं ।एक  दिन वे  शुद्ध स्वदेशी बाबा के पास चले गए कि बाबा हमें भी स्वदेशी आइटमो के फेहरिस्त में शामिल कर लें या कालेधन की तरह उनके लिए भी धरना दें।

यह गोरा चाऊमीन नन्हें-नन्हें आंखों का सुरमा बन गया है ।बाबा सरकार को जाने का इंतजार कर रहे हैं । लोगों को भ्रम है ।देसी आइटम को खाने से पेट  खराब हो जाता है ।पेट घड़-घड़ करने लगता है। हमारे पड़ोस के ताऊ को बहुत दिनों से चटक मटक खाने की इच्छा थी ।और  एक दिन आव देखा न ताव , वे जी भर के प्याज के पकोड़े खाए फिर बाद में पता चला धोती खराब कर ली उनका हाजमा ठीक नहीं था ।कोई चूर्ण काम नहीं आया, पेट सफा का असर ऐन मौके पर होगा ।उन्हें पता नहीं था ।देसी पकौड़ीओं को खाने का यही  डर है ।आलू चप बेचारा चुप है ।वह अपने नाम को धारण कर लिया है ।अब वह आलू चुप हो गया है ।बेईमान दुकानदार बेसन में आटा मिलाकर आलू चप  बना रहे हैं। जिसे स्वाद बिगड़ रहा है ।वह दुखी है ,अपने दुर्गति पर ।प्याजी ! अब क्या जी हो गया है ? और  हर  कोई सिर्फ उसका हाल पूछ रहा है।

धर्मेन्द्र कुमार निराला निर्मल

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