
चारो तरफ जल ही जल है,भूपृष्ठ कहीं दिखाई नही दे रहा है। जहाँ कल मानव जीव चलता था वहाँ नावें चल रही है।अहो भाग्य हो विकास का, गंगा जी जनता द्वार तक आई हैं और वे घरों मे दुबक गये।आरोप है कई सालो से नालों कि सफाई नही हुई,नालों से पानी निकल कर भागा नही और ऊपर ही ऊपर दौड़ने लगा।नेता लोग एक-दूसरे पर आरोप -प्रत्यारोप लगा रहें है,। मुझे पानी कहते हुए इसका अपमान महसूस हो रहा है क्योंकी यह आम पानी नही है इसमे पाप को धोने के शक्ति विधमान है लेकीन दुर्भाग्य है गंगा जी जब द्वार पर आई तो पाटलीपुत्र घरों मे सुबक रहें हैं ,कई दिनो बाद पता चला,कि अमुक -अमुक नेता अपने घरो मे जनता कि नजर से नजर बन्द हैं। गंगा भक्त इस जल मे डुबकी लगाने से कतरा रहें हैं।मिडिया वर्ग का पता नही कहाँ गुम हो गई है वह ऊचाई पर से ही फ्लैक्स मार रही है और लेजर बीम से पानी कि गहराई माप रही है। जलसो के समय तो उसका कैमरा 360 डिग्री घुमता है लेकीन इस बार उसका कैमरा पानी मे डुबुकिया न मार ले यही मोह उसे घेर रखा है। वह इंसान काहे का,जो कभी पानी से,कभी आँधी से डर जाए।जीवन के कठिन परिस्थितियों मे राग निकलती है और यहाँ कई रागी – वैरागी परेशान हो गये। नेता जी पानी से घीरे हुए हैं और कई दिनो से भूखे-प्यासे हैं वे गंगा मईया का व्र त बता रहे हैं ।वे फेंके गये खाने के पैकेट को खाएंगे नही, नेता स्वालंबी जीव होते हैं । उनके हाथ बहुत लंबे होते हैं लेकीन उठाएंगे नही। उन्हे मालुम है इसमे क्या है। ईधर धुर विरोधीयों को हड़ताल के लिए जमीन अलाट नही हो रही है।वे परेशान हैं उनके माथे से तर-तर पसीना चू रहा है चिन्ता से नही श्र म से । वे कैसे बताए कि उनकी पार्ट्री कितना हितैषी है। लोग विवश हैं , कोई इस संकट को प्राकृतिक आपदा बता रहा है तो कोई देवी का प्रकोप।
मुझे आश्चर्य हो रहा है इस बार नेता जी का भैंसिया नजर नही आ रही है जिनका दावा है कि इतना पानी उनकी भैंसिया पी जाती है।
—————- धर्मेन्द्र कुमार निराला निर्मल
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